शनीचर भगवान-अपने खेत में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

शनीचर भगवान-अपने खेत में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

आज शनीचर है
महीने की दूसरी तारीख
पुल के उस पार
कश्मीरी गेट के इर्द-गिर्द
फैली हुई गलियों में
सुबह से आठ बजे शाम तक
किस्म-किस्म की चीज-वस्तु
आपको मिलेगी….

और, पुल के इस पार
आते ही आप
शनीचर भगवान का दर्शन पाते हो….
लोहे की काली परात में
तेल भरा है
उसमें ढेर सारे सिक्के
चमक रहे हैं
दस पैसे, पाँच पैसे, पच्चीस पैसे
पचास पैसे…..

निकट ही पतली लकड़ी में
टँगा एक दफ्ती वाला जुमला….
-‘सावधान, साहब !
आप जियादा चढ़ावा
हर्गिज ना चढ़ाना…
शनी महाराज सराप देंगे…’
शनीचर भगवान के
पुजारी की ऐसी वार्निंग !

आप मिनट भर के लिए रुकते हो
कोट की पाकिट टटोलते हो
सिक्का तो नहीं है !
लेकिन, पास ही पान-बीड़ी वाला
आपकी मदद करता है,
….दस-पैसे, पच्चीस पैसे, पचास पैसे का
सिक्का आपके हवाले करता है…
आप सिगरेट का पैकेट लेकर
शनीचर भगवान को प्रणाम करते हो
पचास पैसे तेल भरे
परात में छोड़ते हो !

अगले शनीचर को
आप सौ अठन्नी
शनीचर महाराज को
चढ़ा आते हो !
पचास रुपये !!

आपकी सास
पिछले वर्ष वैश्नो देवी गयी थी
वो फेमिली के
सारे मेम्बरों के लिए
पाँच-पाँच रुपये वाली टिकटें
खरीद के रक्खे हुए है
‘नियम-निष्ठा’ वाली
साठ साला महिला हैं
सो, इस बार आपके
नाम वाली टिकट का
निकल आया नम्बर
25000 मिलेंगे…

आप एक वामपन्थी पार्टी के
मेम्बर रह चुके हो तरुणाई में
और अब हमदर्द-भर हो !
और आप सौ अठन्नी
खुशी-खुशी चढ़ा आते हो !
शनीचर तुम्हारे सर पर नहीं
दिल में आ विराजे हैं
वो शनीचर का पुजारी
आप जैसे ‘भगत’ को
ढूँढ़कर निकालेगा !!

(25.12.95)

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