शची-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

शची-नहुष -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Nahush

शची
मणिमय बालुका के तट-पट खोल के,
क्या क्या कल वाक्य नैश निर्जन बोल के ।
श्रान्त सुर-सरिता समीर को है भेटती,
क्लान्ति दिन की है उसकी भी मेटती ।

यह रहा मानस तो अमरों के ओक में,
गात्र मात्र ही है मोतियों का नरलोक में ।
पानी चढ़ने से यही चन्द्र-कर चमके ।
पाकर इसी को रवि-रश्मि-शर दमके ।

होती है सदैव नयी वृद्धि परमायु में,
अमर न होगा कौन इस जल-वायु में?
गन्ध पृथिवी का गुन, व्योम भर जो बढ़ा,
आके यहीं उन्नति की चूढ़ा पर है चढ़ा!

मिलता दरस से ही सुख है परस का,
पार क्या परस के बरसते-से रस का ।
डोलता-सा, बोलता-सा एक एक पर्ण है,
वर्ण-पीतता में भी सुवर्ण ही सुवर्ण है।

धूल उड़ती है तब फूलों के पराग की,
पत्र-रचना-सी पड़ती है अनुराग की!
अंक धन का क्या यहां जीवन अशंक है ।
कितनी सजलता है, किन्तु कहाँ पंक है?

फैली सब ओर शान्ति मग्न सुरलोक है,
किन्तु कान्ति-हीना आज इन्द्राणी सशोक है ।
शान्त-सी सखी के साथ तीर पर आ गयी,
शान्त वायुमण्डल में मानो कान्ति छा गयी ।

आज सुरराज शक्र स्वर्गभ्रष्ट हो गया,
और स्वर्ग-वैभव शचि का सब खो गया ।
जी रही है देवराज्ञी, कैसे मरे अमरी,
मंडरा रही है शून्य वृन्त पर भ्रमरी!

दगता है अन्तर, सुलगता ज्यों तुष है;
इन्द्रासनासीन हुआ सहसा नहुष है ।
सह्य किसे स्वाधिकार दूसरे के बस में,
देना पड़ा हो वह भले ही रस रस में ।

“देवि, यथा” बोली सखि-“दनुज दनुज ही,
देव देव ही हैं क्या मनुज मनुज ही ।
सीमा जहाँ जिसकी, रहेगा वहीं वह तो,
सह लो विनोद-सा विपर्यय है यह तो।”

हाय रे विपर्यय! सखी की बात सुनके,
बोली अमरेश्वरी अधीरा सिर धुनके-
“सखी, क्या विपर्यय है जो जहाँ था है वहीं,
सब तो वही के वही, मैं ही वह हूँ नहीं ।

क्या थी, अब कौन हूँ कहाँ थी, अब मैं कहाँ,
क्या न था, परन्तु अब मेरा क्या रहा यहाँ?
आज मैं विदेशिनी हूँ अपने ही देश मैं-
वन्दिनी-सी आप निज निर्मम निवेश में!

हा! दु:स्वप्न ही मैं इसे मान कहीं सकती,
कैसे समझाऊँ मन, जान नहीं सक्ती।
मेरी यह दिव्य धरा आज पराधीना है,
इन्द्राणी अभागिनी है, देवेश्वरी दीना है!

चर्चा कल्प-वृक्ष के फलों की क्या चलाऊँ मैं,
पारिजात-पुष्प ही तो एक चुन लाऊँ मैं,
मेरे उस नन्दन की हाय! कैसी लाज है,
सूखी हरियाली तक मेरे लिए आज है!

निज मुख देखने का इच्छुक क्यों उर है,
सखि, क्या मृगांक मेरा अब भी मुकुर है?”
चिर नवयौवना शची क्या हंसी खेद से,
निकली क्षणिक धूप वर्षा के विभेद से!

“यह मुख-चन्द्र देवि, नित्य परिपूर्ण है,
उड़ता अवश्य आज कुज्झटिका-चूर्ण है,
तूर्ण ही विकीर्ण होंगी किरणें प्रथम-सी,
बैठी ही रहेगी यह वेला क्या विषम-सी ?

फिर भी नहुष तो हमारे चिरभक्त हैं,
दानव नहीं वे महामानव सशक्त हैं,
अपना सहायक हमीने है उन्हें चुना ।
उनके लिए क्या अभी और कुछ है सुना?”

“नहीं किन्तु पद में सदैव एक मद है;
सीमा लांघ जाता उमड़ता जो नद है ।
निश्चय है कब क्या किसी के मन का कहीं,
शंकित हो मेरा मन, आतंकित है यहीं ।

देव सदा देव तथा दनुज दनुज हैं,
जा सकते किन्तु दोनों ओर ही मनुज हैं ।
रह सकती हूँ सावधान दानवों से मैं,
शंकित ही रहती हूँ हाय! मानवों से मैं ।

स्वामी भी कहाँ गये न जाने, मुझे छोड़ के,
वे भी छिप बैठे दु:खनी से मुंह मोड़ के!”
“ऐसा कहना क्या देवि आपको उचित है?
आपसे क्या उनका विभिन्न हिताहित है?

धीरज न छोड़िए, प्रतीक्षा कर रहिए,
निष्क्रिय हो बैठेंगे कभी वे भला कहिए,”
“ठीक सखि, किन्तु मन कैसे रहे हाथ का,
गेह गया और साथ छूटा निज नाथ का ।

कोई युक्ति हाय! मुझे आज नहीं सूझती,
सम्भव जो होता युद्ध तो मैं आप जूझती ।
और मैं दिखाती, रस-मात्र नहीं चखती,
देखते सभी, क्या शक्ति साहस हूँ रखती ।

आहा! जब युद्ध हुआ शुम्भ से, निशुम्भ से,
दैत्यों ने किये थे पान दो दो मद-कुम्भ से,
प्रलय मचा रही थीं धारें खरे पानी की,
तब थी शची ही पक्ष-रक्षिणी भवानी की ।”

होकर भी स्वर्गेश्वरी घोर चिन्ता-चर्चिता,
हो उठी प्रदीप्त आत्म-गौरव से गर्विता ।
दीख उड़ी अश्रुमुखी धूल-धुली माला-सी,
किंवा धूम-राशि में से जागी हुई ज्वाला-सी!

“शक्ति से जो साध्य होगा, साधेगी उसे शची,
किन्तु क्या विवेकी-बुद्धि आज उसमें बची?
कोई भी दिखा दे मार्ग; गति मैं दिखाऊंगी,
चल, गुरु-चरण अभी मैं सखि जाऊँगी ।”

स्नान कर शीघ्र और ध्यान धर पति का,
लेने वरदान चली मानिनी सुमति का ।
जल से निकल के भी डूबी-सी बनी रही ।
तब भी निशा थी, सूक्ष्म चाँदनी तनी रही ।

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