शगुन-शंका-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड एक-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar 

शगुन-शंका-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड एक-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

अब इस नुमाइश की छवियाँ
आँखों में गड़ती हैं,
क्या यह बुरा शगुन है ?

पारसाल घर में
मकड़ियाँ बहुत थीं,
लेकिन जाले परेशान नहीं करते थे ।
बच्चे उद्धत तो थे-
दिन भर हल्ला मचाते थे ।
फिर भी वे कहा मान लेते थे, डरते थे।
अब तो मेरी कमीजें
उन्हें छोटी पड़ती हैं,
क्या यह बुरा शगुन है ?

पारसाल बारिश में
छत बहुत रिसी थी,
लेकिन गिरने का ख़तरा नहीं था।
जैसे सम-सामयिक विचार
मुझे अक्सर अखरते थे
लेकिन मैं उनसे इस तरह
कभी चौंका या डरा नहीं था,
अब मेरे आंगन में रोज़
बिल्लियाँ लड़ती हैं ।
क्या यह बुरा शगुन है ?

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