व्यर्थ है स्मृति का पहरा-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

व्यर्थ है स्मृति का पहरा-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

व्यर्थ है स्मृति का पहरा,
व्यर्थ ही द्वार बन्द करता हूँ, अगर एक बार खिड़की खोल दूं
तो दिनरात भाग जायें अंधेरे काल के पहाड़ पर।

यौवन की निःसंगता आज बुड्ढी हड्डियों में टीसती है,
हृदय का चेरापूंजी नये तर्क से विस्तृत सहारा बन गया है ।

मैं तो एकान्त शून्य में हूँ, तुम स्वदेश में कब थीं यह भी याद नहीं ।

फिर भी अगर तुम आयीं तो बकूल का यही पौधा बढ़ता देखूँगा;
अगर आयीं तो तुम्हारे ही बाग की टहल करूंगा, रोज़ फूल चुनूंगा।

सूर्य अस्त होता है, प्रतिदिन आकाश में गोधूलि आती है,
उस के माथे पर विवाह के रंग में रंगा एक लाल तारा दमक उठता है।

३१/८/५६

 

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