व्यक्तित्व और खण्डहर-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

व्यक्तित्व और खण्डहर-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh

(व्यक्ति किन्हीं भी कारणों से विकेंद्रित हो, परन्तु उसके लिए पुकार अवचेतन
से, जो कि जीवन-शक्ति का रुप है, निकट सम्बन्ध रखती है । वह समग्रता की
ओर, मनस्संगठन की ओर का प्रयत्त केवल बुद्धिगत ही नहीं, शुद्ध जीवनगत
है । परन्तु यह विकेंद्रीकरण अन्तर्बाह्य-विरोध, परिस्थिति-विरोध, आत्मविरोधों
के द्वारा शुरु होता है ।
यह विकेंद्रित व्यक्तित्व, यानी व्यक्तित्व का खण्डहर किसी अबूझे समय में
अपने गत वैभव पर रो उठता है । उसी का कल्पनात्मक चित्रण निम्न कविता
में है ।)

खण्डहरों के मूक औ’ निस्पन्द से
उमड़े अकेले गीत ।

ये भूत से निर्देह भय कर
बैचैन काले व्यथित आतुर
तिमिर नूपुर के अकेले स्वर,
उमड़े अकेले गीत ।

हुए चंचल भयद श्यामल
भूत सम आकुल अकेले गीत
रात में जब छा चुका खण्डहर तिमिर में,
तिमिर खण्डहर में,
घूमते उस कांपती-सी वायु के स्वर में
अकेले गीत ।

तम आवरण में लुप्त झरती धार के तट पर
रागिनी में म्लान-तन-मन-तरुण-रोदन-गीत
भर चला जाता विपिन के पात पुष्पों में प्रकम्पन
शिथिल उर गम्भीर सिहरन ।
ये अकेले गीत

दब चुकी जो मर चुकी है आत्मा,
ख़त्म जो हो ही गयी आकांक्षा,
व्यक्ति में व्यक्तित्व के खण्डहर
गान कर उठते उसी के गीत ।
ये अकेले गीत, स्वरलय-हीन गीत
मीन से बेचैन, लोचन-हीन गीत ।

शीत रजनी काँप उठती
भर विजन के गीत, खण्डहर गीत
ये अकेले गीत, पत्थर गीत, हिम के गीत
अन्धी गुफा के गीत !
बैचेन भूतों-से, व्यथित के स्वप्न-से वे गीत !
वे दुष्ट औ’ दयनीय गीत,
कमज़ोर औ’ कमनीय गीत,
उन्माद की तृष्णा सरीखे गीत !
स्वप्न की विक्षुब्ध सरिता के भयानक गीत !
निशि के अकेले औ’ अचानक गीत !

विपिन औ’ निर्झर,
तिमिर के घन आवरण में, भावना के इस मरण में
हैं हुए भय-स्तब्ध, तन निष्पन्द, दिग् रव-हीन
क्योंकि आलोड़ित हुआ विक्षुब्ध गीतों का महा तूफान,
ले तीक्ष्ण स्वर-सागर-उफान ।

तम शून्य में नभ के प्रवाहित हो चला भूचाल-सा यह गान
इस शीत स्वर के
कष्टदायी स्पर्श-शर-निर्झर प्रखर से
हुआ आप्लावित रुदित वन का सतत कमज़ोर प्रान्तर-प्राण
दब चुकी जो मर चुकी है आत्मा,
ख़त्म जो हो गयी, आकांक्षा ।

आज चढ़ बैठी अचानक, भूत-सी इस कांपते नर पर
विक्षुब्ध कम्पन बन चढ़ी जाती सरल स्वर पर
प्रश्न ले कर, कठिन उत्तर साथ ले कर,
रात के सिर पर चढ़ी है, नाश का यह गीत बन कर ।
हंस पड़ेगी कब सहज प्रकाश का यह गीत बन कर !

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