वो सार है मेरी मगर शीर्षक हो नहीं सकते-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

वो सार है मेरी मगर शीर्षक हो नहीं सकते-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

जो कहना चाहते उनसे
वो भाव जुबां पर ला नहीं सकते
मचलते है जो उनके ख़्वाब
हक़ीक़त उनकी, उन्हें हम पा नहीं सकते
बड़ा खूब है उनसे मेरा नए दौर का इश्क़
वक़्त से देर है दोनों, पर दोष किसी को दे नहीं सकते
मुहब्बत निर्मोही जो रिश्तों में
उन्हें बराबर लिख नहीं सकते…

लुभाती है उनकी बातें
उन्हें सुनने को जीते है
पर वो जो कहना है उन्हें हमसे
वो हमसे कह नहीं सकते
उनकी आंखों में हर पल है
पर दिल में हो नही सकते
वो जो कहना चाहते उनसे
वो भाव जुबां पर ला नहीं सकते..

नदी के किनारों सा है ये रिश्ता
साथ तो है हर-पल में
पर एक दूसरे से मिल नहीं सकते
कृष्ण और राधा सी किस्मत
जुदा जो हो गए कल में
कम्बख़्त रो भी नहीं सकते
क्या लिखूं उनपे मेरी कविता
वो सार है मेरी मगर शीर्षक हो नहीं सकते…!!

 

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