वो मुझको देख कुछ इस ढब से शर्मसार हुआ-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

वो मुझको देख कुछ इस ढब से शर्मसार हुआ-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

वो मुझको देख कुछ इस ढब से शर्मसार हुआ
कि मैं हया हो पे उसकी फ़क़त निसार हुआ

सभी को बोसे दिये हंस के और हमें गाली
हज़ार शुक्र भला इस कदर तो प्यार हुआ

हमारे मरने को हां तुम तो झूठ समझे थे
कहा रकीब ने, लो अब तो एतबार हुआ ?

करार करके न आया वो संग-दिल काफ़िर
पड़ें करार पे पत्थर, ये कुछ करार हुआ ?

गले का हार जो उस गुलबदन का टूट पड़ा
तो डर नज़र का वहीं उसको एक बार हुआ

किसी से और तो कुछ बस चला न उसका ”नज़ीर”
निदान मेरे ही आकर गले का हार हुआ

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