वो आँख जबान हो गई है-गुल-ए-नग़मा-फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

वो आँख जबान हो गई है-गुल-ए-नग़मा-फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

वो आँख ज़बान हो गई है
हर बज़्म की जान हो गई है।

आँखें पड़ती है मयकदों की,
वो आँख जवान हो गई है।

आईना दिखा दिया ये किसने,
दुनिया हैरान हो गई है।

उस नरगिसे-नाज़ में थी जो बात,
शायर की ज़बान हो गई है।

अब तो तेरी हर निगाहे-काफ़िर,
ईमान की जान हो गई है।

तरग़ीबे-गुनाह लहज़ह-लहज़ह,
अब रात जवान हो गई है।

तौफ़ीके-नज़र से मुश्किले-ज़ीस्त,
कितनी आसान हो गई है।

तस्वीरे-बशर है नक़्शे-आफ़ाक,
फ़ितरत इंसान हो गई है।

पहले वो निगाह इक किरन थी,
अब इक जहान हो गई है।

सुनते हैं कि अब नवा-ए-शाएर,
सहरा की अज़ान हो गई है।

ऐ मौत बशर की ज़िन्दगी आज,
तेरा एहसान हो गई है।

कुछ अब तो अमान हो कि दुनिया,
कितनी हलकान हो गई है।

ये किसकी पड़ी ग़लत निगाहें,
हस्ती बुहतान हो गई है।

इन्सान को ख़रीदता है इन्सान,
दुनिया भी दुकान हो गई है।

अक्सर शबे-हिज़्र दोस्त की याद,
तनहाई की जान हो गई है।

शिर्कत तेरी बज़्मे-क़िस्सागो में,
अफ़्साने की जान हो गई है।

जो आज मेरी ज़बान थी, कल,
दुनिया की ज़बान हो गई है।

इक सानिहा-ए-जहाँ है वो आँख,
जिस दिन से जवान हो गई है।

दिल में इक वार्दाते-पिनहाँ,
बेसान गुमान हो गई है।

सुनता हूँ क़ज़ा-ए-कह्‍रमाँ भी,
अब तो रहमान हो गई है।

वाएज़ मुझे क्या ख़ुदा से,
मेरा ईमान हो गई है।

मेरी तो ये कायनाते-ग़म भी,
जानो-ईमान हो गई है।

मेरी हर बात आदमी की,
अज़मत का निशान हो गई है।

यादे-अय्यामे-आशिक़ी अब,
अबदीयत इक आन हो गई है।

जो शोख़ नज़र थी दुश्मने-जाँ,
वो जान की जान हो गई है।

हर बैत ’फ़िराक़’ इस ग़ज़ल की
अबरू की कमान हो गई है।

 

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