वे जो वसन्तदिन-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh 

वे जो वसन्तदिन-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

 

और एक
और एक दिन इसी तरह ढल जाता है पहाड़ के पीछे
और हम निःशब्द बैठे रहते हैं।
नीचे गाँव से उठ रहा है किसी हल्ले का आभास
हम एक-दूसरे का चेहरा देखते हैं।
अकड़ी हुई लताओं की मानिन्द लिपटे रहते हैं हम
और चेहरे पर आकर जम जाती हैं बर्फ़ की कणिकाएँ
इच्छा होती है सोचें कि हम
अतिकाय बर्फ़ीले-मानव हैं।
आग जलाकर बैठते हैं चारों ओर
कहते हैं, अहा, आओ गपशप की जाए।
वे जो वसन्तदिन थे…
वे जो वसन्तदिन थे…
और वसन्तदिन सचमुच हमारे हाथ छोड़
सूदूर जाने लगते हैं!

 

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