वृद्धाश्रम-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

वृद्धाश्रम-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

मकरन्द बिना सुगंध बिना,
क्या पुष्प पुष्प रह जाता है,
पात जब तरु से करे पलायन,
सूख के मृत होजाता है,
भरत भूमि आदर्श बनी,
संस्कार प्रतिष्ठा सम्मान की,
निज संस्कृति ने हमको सिखाया,
रक्षा करो वृद्धो के मान की,
आधुनिकता के इस दौर का,
कैसा है ये नया आगम,
कृतघ्न होगया है मनुष्य,
रह गए तो केवल वृद्धाश्रम।

सत्य झूठ की परख न रही,
दायित्वों की तड़प न रही,
जिन चरणों मे वात्सल्य था,
उनकी किसीको खबर न रही,
जीवन शैली शिखर पे रखनी,
दौर है ये निजस्वार्थ का,
भावो की अस्थियां उठ गई,
उन्माद है केवल व्यर्थ का,
आदर मृदुता का भाव,
हे प्रभु ये कितना बड़ा है श्रम,
कृतघ्न होगया है मनुष्य,
रह गए तो केवल वृद्धाश्रम।

संस्तुतियों की तृष्णा न बुझती,
संपदा सब कुछ स्थगित न करती,
समय का सदा अभाव रहता है,
फिर भी माँ की ममता नही मरती,
मित्रो के लिए है नव आयोजन,
जन्मदाता के मुख में न निवाला है,
लोचन क्यों मूँदे बैठे सब,
कितना मनुष्य मतवाला है,
पूजा अर्चना व्रत व्यर्थ है उनकी,
जो करते अनादर ईश्वर का हरदम,
कृतघ्न होगया है मनुष्य,
रह गए तो केवल वृद्धाश्रम।

 

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