वीर-वन्दना-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

वीर-वन्दना-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

 

1

वीर-वन्दना की वेला है, कहो, कहो क्या गाऊं ?
आँसू पातक बनें नींव की ईंट अगर दिखलाऊं ।
बहुत कीमती हीरे-मोती रावी लेकर भागी,
छोड़ गई जालियाँबाग की लेकिन, याद अभागी ।
कई वर्ष उससें पहले, जब देश हुआ स्वाधीन,
लहू जवानों का पीती थी भारत में संगीन ।

2

वीर-वन्दना की वेला है, कहो, कहो क्या गाऊं ?
भांति-भांति के चित्र टंगे हैं, किसको, कौन दिखाऊँ ?
यह बहादुरों की लाशों से पटा हुआ है खेत,
यह प्रयाग की इन्द्राणी पर टूट रहे हैं बेंत ।
कई वर्ष उससे पहले जब देश हुआ स्वाधीन,
भगत सिंह फांसी पर झूले, घुल-घुल मरे यतीन ।

3

वीर-वन्दना की वेला है, कहो, कहो क्या गाऊं ?
पन्ने पर पन्ने अनेक हैं, पहले किसे उठाऊँ ?
है कौंध गई बिजली-सी भारत में प्रताप की याद,
इम्फल में बन गया किरिच बापू का आशीर्वाद ।
कई मास उससे पहले जब देश हुआ स्वाधीन,
भूले हुए खड़ग से लिक्खा हमने पृष्ठ नवीन ।

4

वीर-वन्दना की वेला है, कहो, कहो क्या गाऊं ?
अमर ज्योति वह कहाँ देश की जिसको शीश झुकाऊँ ?
दिखा नहीं दर्पण पातक का, अरे गांस मत मार,
अश्रु पोंछकर जीने को होने तो दे तैयार ।
काल-शिखर से बोल रहा यह किस ऋषि का बलिदान,
कमलपत्र पर लिखो, लिखो कवि ! भारत का जयगान ।
(1949)

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