विहार-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

विहार-तार सप्तक -गजानन माधव मुक्तिबोध-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gajanan Madhav Muktibodh 

#1.
रवि का प्रकाश,
शशि का विकास-
पुंसत्वहीन नर का विलास ।
ये सूर्य-चन्द्र,
नभ-वक्ष लुब्ध,
वे अमित वासना के शिकार ।
वे गगन दीन
वे रसिक रुग्ण,
पुंसत्वहीन वेश्या-विहार ।
इन का प्रकाश
जग के विशाल
शव का सफ़ेद परिधान साफ़ ।
है त्यक्त गेह
आत्मा अदेह
उड़ चली गटर से बनी भाफ़ ।

#2.
दिन के बुख़ार
रात्रि की मृत्यु
के बाद हृदय पुंसत्वहीन,
अन्तर्मनुष्य
रिक्त-सा गेह
दो लालटेन-से नयन दीन;
निष्प्रान स्तम्भ
दो खड़े पाँव
लकड़ी का खोखा वक्ष रिक्त;
मस्तिष्क तेल
की है मशीन
संसार-क्षेत्र है तैल-सिक्त ।
दिन के बुख़ार
रात्रि की मृत्यु
के बाद हृदय दु:ख का नरक,
रात्रि के शून्य
दो देह युक्त-
दो रिक्त प्राण व्यंग्य में ग़र्क !

Leave a Reply