विस्फोट-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

विस्फोट-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

चिथड़े-चिथड़े उड़े सभी के
अपनों की पहचान नहीं,
रक्त – सनी इस मिट्टी में
लिपटी गुड़िया में जान नहीं।

बिखरे कहीं कटे पग दिखते
कहीं रक्त रंजित तन भी,
कोई गहरा जख्म लिये तो
है कोई मरणासन्न भी।

खोज रही माँ अपने सुत को
बेसुध भाई , बहनों को,
कौन चुने पथ पर बिखरे जो
मुक्ता , स्वर्णिम गहनों को।

हाहाकार मचा घर – घर में
जाने क्या अब कल होगा,
चिता जलेंगी एक साथ जब
क्रूर, कठिन वह पल होगा।

किसने की इतनी निर्दयता
किसका है यह पागलपन,
इतनी कटुता किसके उर में
खण्डित है मन का दर्पण?

खून बहा नहीं मिला कभी कुछ
दर्प जिगर में पलता है,
भ्रमित जवानी, मन की पशुता
रग-रग फैली जड़ता है।

दयाहीन, मत बन कठोर,
धर्मान्ध न हो, नर चल पथ पर,
विजय सदा तब ही होती
जब कृष्ण विराजित हों रथ पर।

कैसी वह शिक्षा जिसमें
अपना विवेक है मर जाता?
बुद्धि क्षीण हो जाती व
विष हृदय कलश में भर जाता।

उषा काल , चहुँओर उजाला
दूर दृष्टि तुम कर सकता,
छोड़ मुक्ति की मिथक धारणा
जीवन रस से भर सकता।

शर्त यही तज तू कृपाण
जीवन में मधुता आ जाये,
अपने हों या फिर गैर कोई
ममता की बदली छा जाये।

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