विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya Part 4

विश्वप्रिया-चिन्ता अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya Part 4

इंदु तुल्य शोभने

इन्दु-तुल्य शोभने, तुषार-शीतले!
हीरक-सी थी तू अतिशय ज्योतिर्मय, तेरी उस आभा ने मुझे भुलाया।
हीरक है पाषाण- अधिक काठिन्यमय! आज जान मैं पाया!
आज- दर्प जब चूर्ण हो चुका तेरे चरण तले!
इन्दु-तुल्य शोभने, तुषार-शीलते!
बार-बार अब आ कर कहता संशय-
तू नत था इस वज्रखंड के सम्मुख
मैं था? या प्राणों में कोई दानव दुर्जय, दुर्निवार, प्रलयोन्मुख!
अब, जब मेरे जीवन-दीपक बुझ-बुझ सभी चले!
इन्दु-तुल्य शोभने, तुषार-शीतले!

लाहौर किला, 15 मार्च, 1934

चुक गया दिन

‘चुक गया दिन’—एक लम्बी साँस
उठी, बनने मूक आशीर्वाद—
सामने था आर्द्र तारा नील,
उमड़ आई असह तेरी याद!
हाय, यह प्रति दिन पराजय दिन छिपे के बाद!

चम्पानेर (रेल में), 23 सितम्बर, 1939

बाहर थी तब राका छिटकी

बाहर थी तब राका छिटकी!
यदि तेरा इंगित भर पाता, क्यों विभ्रम में बाहर आता?
प्रेयसि! तुम ही कुछ कह देतीं, तब जब थी मेरी मति भटकी!
पुरुष? तर्क का कठपुतला-भर, स्त्री- असीम का अन्त:निर्झर!
पर मैं तब भी रोया था यद्यपि, मेरी जिह्वा थी अटकी!
बाहर रूठ चला मैं आया- अब जाना, धोखा था खाया-
अब, जब एक असीम रिक्तता प्राणों के मन्दिर में खटकी!
बाहर थी तब राका छिटकी!

लाहौर, 20 दिसम्बर, 1934

हम एक हैं

हम एक हैं। हमारा प्रथम मिलन बहुत पहले हो चुका- इतना पहले कि हम अनुमान भी नहीं लगा सकते। हम जन्म-जन्मान्तर के प्रणयी हैं।
फिर इतना वैषम्य क्यों? क्या इतने कल्पों में भी हम एक-दूसरे को नहीं समझ पाये?
प्रेम में तो अनन्त सहानुभूति और प्रज्ञा होती है, वह तो क्षण-भर में परस्पर भावों को समझ लेता है, फिर इतने दीर्घ मिलन के बाद भी यह अलगाव का भाव क्यों?

दिल्ली जेल, 17 जुलाई, 1932

मैं अपने अपनेपन से

मैं अपने अपनेपन से मुक्त हो कर, निरपेक्ष भाव से जीवन का पर्यवलोकन कर रहा हूँ।
एक विस्तृत जाल में एक चिड़िया फँसी हुई छटपटा रही है। पास ही व्याध खड़ा उद्दंड भाव से हँस रहा है।
चिड़िया को फँसी और छटपटाती देख कर मुझे पीड़ा और समवेदना नहीं होती, मैं स्वयं वह चिड़िया नहीं हूँ। न ही मुझे सन्तोष और आह्लाद होता है-मैं व्याध नहीं हूँ। मुझे किसी से भी सहानुभूति नहीं है। मैं तुम्हारी माया के जाल को दूर से देखने वाला एक दर्शक हूँ।
मैं अपने अपनेपन से मुक्त हो कर, निरपेक्ष भाव से अपने जीवन का पर्यवलोकन कर रहा हूँ।

दिल्ली जेल, 18 दिसम्बर, 1932

मैं तुम्हें किसी भी वस्तु की

मैं तुम्हें किसी भी वस्तु की असूया नहीं करता- किन्तु तुम सब कुछ ले कर चली-भर जाओ, मेरे जीवन में से सदा के लिए लुप्त हो जाओ!
तुम ने मुझे वेदना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दिया; मुझ में वही वेदना जम कर और वद्र्धमान हो कर पुष्पित हो गयी है।
तुम चाहो, तो उन पुप्पों को तोड़ ले जाओ, जो वस्तु मैं ने अपने जीवन की अग्नि में तपा कर और भस्म करके सिद्ध की है उसे अभिमानपूर्वक, सदर्प ले जाओ, जैसे कोई सम्राज्ञी किसी दास का तुच्छ उपहास ग्रहण करती है- किन्तु ले कर फिर बस चली-भर जाओ, मेरे जीवन के क्षितिज से परे, जहाँ तुम्हारे उत्ताप का आलोक भी मेरे दृष्टिगोचर न हो!

दिल्ली जेल, 26 फरवरी, 1933

अपने प्रेम के उद्वेग में

अपने प्रेम के उद्वेग में मैं जो कुछ भी तुम से कहता हूँ, वह सब पहले कहा जा चुका है।
तुम्हारे प्रति मैं जो कुछ भी प्रणय-व्यवहार करता हूँ, वह सब भी पहले हो चुका है।
तुम्हारे और मेरे बीच में जो कुछ भी घटित होता है उस से तीक्ष्ण वेदना-भरी अनुभूति मात्र होती है- कि यह सब पुराना है, बीत चुका है, कि यह अभिनय तुम्हारे ही जीवन में मुझ से अन्य किसी पात्र के साथ हो चुका है!
यह प्रेम एकाएक कैसा खोखला और निरर्थक हो जाता है!

दिल्ली जेल, 16 मार्च, 1933

इस प्रलयंकर कोलाहल में

इस प्रलयंकर कोलाहल में मूक हो गया क्यों तेरा स्वर?
एक चोट में जान गया मैं- यह जीवन-अणु कितना किंकर!
झुकने दो जीवन के प्यासे इस मेरे अभिमानी मन को-
आओ तो, ओ मेरे अपने, चाहे आज मृत्यु ही बन कर!

1938

मैं केवल एक सखा चाहता था

मैं केवल एक सखा चाहता था।
मेरे हृदय में अनेकों के लिए पर्याप्त स्थान था। संसार मेरे मित्रों से भरा पड़ा था। किन्तु यही तो विडम्बना थी- मैं असंख्य मित्र नहीं चाहता था, मैं चाहता था केवल एक सखा!
नियति ने मुझे वंचित रखा। इसलिए नहीं कि मैं ने कामना नहीं की, या खोज में यत्नशील नहीं हुआ। कितनी उग्र कामना की थी! और प्रयत्न? मैं ने इसी खोज में विश्व छान डाला और आज यहाँ हूँ…

दिल्ली जेल, 1 अगस्त, 1932

छलने! तुम्हारी मुद्रा खोटी है

छलने! तुम्हारी मुद्रा खोटी है।
तुम मुझे यह झूठे सुवर्ण की मुद्रा देते अपने मुख पर ऐसा दिव्य भाव स्थापित किये खड़ी हो! और मैं तुम्हारे हृदय में भरे असत्य को समझते हुए भी चुपचाप तुम्हारी दी हुई मुद्रा को स्वीकार कर लेता हूँ।
इसलिए नहीं कि तुम्हारी आकृति मुझे मोह में डाल देती है- केवल इस लिए कि तुम्हारे असत्य कहने की प्रकांड निर्लज्जता को देख कर मैं अवाक् और स्तिमित हो गया हूँ।

दिल्ली जेल, 16 अगस्त, 1932

 देवता

देवता! मैं ने चिरकाल तक तुम्हारी पूजा की है। किन्तु मैं तुम्हारे आगे वरदान का प्रार्थी नहीं हूँ।
मैं ने घोर क्लेश और यातना सह कर पूजा की थी। किन्तु अब मुझे दर्शन करने का भी उत्साह नहीं रहा। पूजा करते-करते मेरा शरीर जर्जर हो गया है, अब मुझ में तुम्हारे वरदान का भार सहने की क्षमता नहीं रही।
मैं ने तुम्हें अपनी आराधना से प्रसन्न-भर कर लिया है। अब अत्यन्त जर्जर हो गया हूँ और कुछ चाहता नहीं; किन्तु पूर्वाभ्यास के कारण अब भी आराधना किये जा रहा हूँ।

दिल्ली जेल, 17 जुलाई, 1932

 

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