विलयन-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta 

विलयन-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

शब्द मुझ तक आया
और बोला,
—मुझे अपनी भाषा नहीं
स्वत्व बनाओ।
और वह अपने भाषा-व्यक्तित्व पर से
अर्थ उतारने लगा।
जैसे अर्थ केंचुल था।
मैं नहीं समझ पा रहा था, कि
क्यों वृक्ष, सहसा अपनी छालें उतारने लगे थे।
क्यों नदी, अपनी देह पर से
जल निहारती लग रही थी
और फूल, वर्ण-गंध के अलंकार।
आकाश ने अपनी
शालीन तथा उद्दंड हवाएँ उतारकर
समुद्रों में रखनी चाहीं
तो वे अनायास ही ज्वारों से भर उठे।

अर्थ से मुक्त
शब्द—
तत्त्व बन गया था,
तभी अक्षरभाव से वह
एक क्षण के लिए प्रकाशित हुआ
और क्षणांत में मुझमें लीन हो गया।
अब जब कभी मैं शब्द होता हूँ
तो यह सृष्टि मेरा अर्थ
और जब कभी सृष्टि शब्द होती है
तो मैं उसका अर्थ।

 

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