विपथगा-हुंकार -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

विपथगा-हुंकार -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन,
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन,

मेरी पायल झनकार रही तलवारों की झनकारों में
अपनी आगमनी बजा रही मैं आप क्रुद्ध हुंकारों में !
मैं अहंकार सी कड़क ठठा हन्ति विद्युत् की धारों में,
बन काल-हुताशन खेल रही पगली मैं फूट पहाड़ों में,
अंगडाई में भूचाल, सांस में लंका के उनचास पवन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

मेरे मस्तक के आतपत्र खर काल-सर्पिणी के शत फन,
मुझ चिर-कुमारियों के ललाट में नित्य नवीन रुधिर-चन्दन
आँजा करती हूँ चिता-धूम का दृग में अंध तिमिर-अंजन,
संहार-लापत का चीर पहन नाचा करती मैं छूम-छनन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

पायल की पहली झमक, सृष्टि में कोलाहल छा जाता है
पड़ते जिस ओर चरण मेरे, भूगोल उधर दब जाता है।
लहराती लपट दिशाओं में, खलभल खगोल अकुलाता है,
परकटे विहाग-सा निरवलम्ब गिर स्वर्ग नरक जल जाता है,
गिरते दहाड़ कर शैल-श्रृंग मैं जिधर फेरती हूँ चितवन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

रस्सों से कसे जबान पाप-प्रतिकार न जब कर पाते हैं,
बहनों की लुटती लाज देखकर काँप-कांप रह जाते हैं,
शस्त्रों के भय से जब निरस्त्र आंसू भी नहीं बहाते हैं,
पी अपमानों के गरल-घूँट शासित जब ओठ चबाते हैं,
जिस दिन रह जाता क्रोध मौन, मेरा वह भीषण जन्म लगन
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन!

पौरुष को बेडी डाल पाप का अभय रास जब होता है,
ले जगदीश्वर का नाम-खडग कोई दिल्लीश्वर धोता है,
धन के विलास का बोझ दुखी-दुर्बल दरिद्र जब ढोता है,
दुनियां को भूखों मार भूप जब सुखी महल में सोता है,
सहती कब कुछ मन मार प्रजा,कसमस करता मेरा यौवन
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

श्वानों को मिलते दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
माँ की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं,
युवती के लज्जा वासन बेच जब ब्याज चुकाए जाते हैं,
मालिक जब तेल-फुलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते हैं,
पापी महलों का अहंकार देता मुझको तब आमंत्रण !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

डरपोक हुकूमत जुल्मों से लोहा जब नहीं बजाती है,
हिम्मतवाले कुछ कहते हैं, तब जीभ तराशी जाती है,
उलटी चालें ये देख देश में हैरत-सी छा जाती है,
भट्ठी की ओदी आंच छिपी तब और अधिक धुन्धुआती है,
सहसा चिंघार खड़ी होती दुर्गा मैं करने दस्यु-दलन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

चढ़कर जूनून-सी चलती हूँ, मृत्युंजय वीर कुमारों पर,
आतंक फ़ैल जाता कानूनी पार्लमेंट, सरकारों पर,
‘नीरों’ के जाते प्राण सूख मेरे कठोर हुंकारों पर,
कर अट्टहास इठलाती हूँ जारों के हाहाकारों पर,
झंझा सी पकड़ झकोर हिला देती दम्भी के सिंहासन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

मैं निस्तेजों का तेज, युगों के मूक मौन की बानी हूँ,
दिल-जले शासितों के दिल की मैं जलती हुई कहानी हूँ,
सदियों की जब्ती तोड़ जगी, मैं उस ज्वाला की रानी हूँ,
मैं जहर उगलती फिरती हूँ, मैं विष से भरी जवानी हूँ,
भूखी बाघिन की घात घूर, आहत भुजंगिनी का दंसन ।
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

जब हुई हुकूमत आँखों पर, जनमी चुपके मैं आहों में,
कोड़ुों की खाकर मार पली पीड़ित की दबी कराहों में,
सोने-सी निखर जवान हुई तप कड़े दमन के दाहों में,
ले जान हथेली पर निकली मैं मर-मिटने की चाहों में,
मेरें चरणों में खोज रहे भय-कम्पित तीनों लोक शरण ।
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

असि की नोकों से मुकुट जीत अपने सिर उसे सजाती हूँ,
ईश्वर का आसन छीन कूद मैं आप खडी हो जाती हूँ,
थर-थर करते कानून-न्याय इङ्गित पर जिन्हें नचाती हूँ,
भयभीत पातकी धर्मों से अपने पग मैं धुलवाती हूँ,
सिर झुका घमंडी सरकारें करती मेरा अर्चन-पूजन ।
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

मुझ विपथगामिनी को न ज्ञात किस रोज किधर से आऊँगी,
मिट्टी से किस दिन जाग क्रुध्द अम्बर में आग लगाऊँगी,
आँखें अपनी कर बन्द देश में जब भूकम्प मचाऊँगी,
किसका टूटेगा श्रृंग, न जानें, किसका महल गिराऊँगी ।
निर्बन्ध, क्रूर, निर्मोह सदा मेरा कराल नर्तन-गर्जन ।
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

अब की अगस्त्य की बारी है, पापों के पारावार ! सजग,
बैठे ‘विसूवियस’ के मुख पर भोले अबोध संसार, सजग,
रेशों का रक्त कृशानु हुआ, ओ जुल्मी की तलवार, सजग,
दुनिया के नीरो, सावधान, दुनिया के पापी जार, सजग !
जाने किस दिन फुंकार उठें, पद-दलित काल-सर्पों के फन !
झन-झन-झन-झन-झन झनन-झनन !

(ससराम, १९३८ ई०)

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