विनय तथा भक्ति सूर सुखसागर-भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 1

विनय तथा भक्ति सूर सुखसागर-भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 1

मंगलाचरण ( राग बिलावल)

चरन-कमल बंदौं हरि-राइ ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधे को सब कछु दरसाइ ।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै ,रंक चलै सिर छत्र धराइ ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ॥1॥

सगुणोपासना (राग कान्‍हरो)

अबिगत-गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौं गूँगै मीठे फल कौ रस अंतरगत हीं भावै ।
परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी कौं अगम अगोचर, सो जानै जो पावै ।
रूप-रेख-गुन-जाति जुगति-बिनु निरालंब कित धावै ।
सब विधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन-पद गावै ॥2॥

भक्त-वत्सलता ( राग मारु)

बासुदेव की बड़ी बड़ाई ।
जगत-पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि-की सहत ढिठाई ।
भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई ।
सिव-बिरंचि मारन कौं धाए, यह गति काहू देव न पाई ।
बिनु-बदलैं उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई ।
रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौं मिले भरत की नाई ।
बकी कपट करि मारन आई, सौ हरि जू बैकुंठ पठाई ।
बिनु दीन्हैं ही देत सूर-प्रभु, ऐसे हैं जदुनाथ गुसाईं ॥3॥

राग धनाश्री
प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ ।
अति-गंभीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ ।
तिनका सौं अपने जनकौ गुन मानत मेरु-समान ।
सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिं बूँद-तुल्य भगवान ।
बदन-प्रसन्न कमल सनमुख ह्वै देखत हौं हरि जैसें ।
बिमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौं तौ तैसें ।
भक्त-बिरह-कातर करुनामय, डोलत पाछैं लागे ।
सूरदास ऐसे स्वामौ कौं देहिं पीठि सो अभागे ॥4॥

राग मारु* ऐसी को करी अरु भक्त लीजै।* जैसी जगदीश जिय धरी लाजै।।* हिरनकस्‍यप बढ़यो उदय अरु अस्‍त लौं, हठी प्रहलाद चित चरन लायौ।* भीर के परे तैं धी सबहिनि तजी, खंभ तैं प्रगट ह्रै जन छुड़ायौ।* ग्रस्‍यौ गज ग्राह लै चल्‍यौ पाताल कौं, काल कैं त्रास मुख नाम आयौ।* छांडि सुख धाम अरु गरुड़ तजि सांवरौ, पवन के गवन तैं अधिक धायौ।* कोपि कौरव गहे केस सभा मैं, पांडु की वधु जस नैंकु गायौ।* लाज के साज मैं हुती ज्‍यौं द्रौपदी, बढ़यौ तन-चीर नहिं अंत पायौ।* रोर कै जोर तैं सोर धरनी कियौ, चल्‍यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढौ।* जोरि अंजलि मिले, छोरि तंदुल लए, इंद्र के विभव तैं अधिक बाढ़ौ।* सक्र कौ दान-बलि मान ग्‍वारनि लियौ, गह्रौ गिरिपानि, जस जगत छायौ।* यहै जिय जानि कैं अंध भव त्रास तै, सूर कामी कुटिल सरन आयौ ।।5।।** रामभक्तवत्सल निज बानौं ।
जाति, गोत कुल नाम, गनत नहिं, रंक होइ कै रानौं ।
सिव-ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु, हौं अजान नहिं जानौं ।
हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीं, सो हमता क्यौं मानौं ?
प्रगट खंभ तैं दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ ।
रघुकुल राघव कृष्न सदा ही, गोकुल कीन्हौं थानौ ।
बरनि न जाइ भक्त की महिमा, बारंबार बखानौं ।
ध्रुव रजपूत, बिदुर दासी-सुत कौन कौन अरगानौ ।
जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनि हाथ बिकानौ ।
राजसूय मैं चरन पखारे स्याम लिए कर पानौ ।
रसना एक, अनेक स्याम-गुन, कहँ लगि करौं बखानौ !
सूरदास-प्रभु की महिमा अति, साखी बेद पुरानी ॥3॥

काहू के कुल तन न विचारत ।
अबिगत की गति कहि न परति है, व्याध अजामिल तारत ।
कौन जाति अरु पाँति बिदुर की, ताही कैं पग धारत ।
भोजन करत माँगि घर उनकैं, राज मान-मद टारत ।
ऐसे जनम-करम के ओछनि हूँ ब्यौहारत ।
यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ, भक्त-बछल-पन पारत ॥4॥

सरन गए को को न उबार्यौ ।
जब जब भीर परी संतनि कौं, चक्र सुदरसन तहाँ सँभार्यौ ।
भयौ प्रसाद जु अंबरीष कौं, दुरबासा को क्रोध निवार्यौ ।
ग्वालिन हेत धर्यौ गोबर्धन, प्रगट इंद्र कौ गर्ब प्रहार्यौ ।
कृपा करी प्रहलाद भक्त पर, खंभ फारि हिरनाकुस मार्यौ ।
नरहरि रूप धर्यौ करुनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदार्यौ ।
ग्राह ग्रसत गज कौं जल बूड़त, नाम लेत वाकौ दुख टार्यौ ।
सूर स्याम बिनु और करै को, रंग भूमि मैं कंस पछार्यौ ॥5॥

स्याम गरीबनि हूँ के गाहक ।
दीनानाथ हमारे ठाकुर , साँचे प्रीति-निवाहक ।
कहा बिदुर की जाति-पाँति, कुल, प्रेमी-प्रीति के लाहक ।
कह पांडव कैं घर ठकुराई ? अरजुन के रथ-बाहक ।
कहा सुदामा कैं धन हौ ? तौ सत्य-प्रीति के चाहक ।
सूरदास सठ, तातैं हरि भजि आरत के दुख-दाहक ॥6॥

जैसें तुम गज कौ पाउँ छुड़ायौ ।
अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ ।
जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं, तहँ तहँ आपु जनायौ ।
भक्ति हेतु प्रहलाद उबार्यौ, द्रौपदि-चीर बढ़ायौ ।
प्रीति जानि हरि गए बिदुर कैं, नामदेव-घर छायौ ।
सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ ॥7॥

जापर दीनानाथ ढरै ।
सोइ कुलीन, बड़ौ सुंदर सोइ, जिहिं पर कृपा करै ।
कौन विभीषन रंक-निसाचर हरि हँसि छत्र धरै ।
राजा कौन बड़ौ रावन तैं, गर्बहिं-गर्ब गरै ।
रंकव कौन सुदामाहूँ तैं आप समान करे ।
अधम कौन है अजामील तें जम तहँ जात डरै ।
कौन विरक्त अधिक नारद तैं, निसि-दिन भ्रमत फिरै ।
जोगी कौन बड़ौ संकर तैं, ताकौं काम छरै ।
अधिक कुरूप कौन कुबिजा तैं, हरि पति पाइ तरै ।
अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम बियोग भरै ।
यह गति-मति जानै नहिं कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै ।
सूरदास भगवंत-भजन बिनु फिरि फिरि जठर जरै ॥8॥

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