विनय तथा भक्ति सूर सुखसागर-भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 2

विनय तथा भक्ति सूर सुखसागर-भक्त सूरदास जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Surdas Ji Part 2

 

अविद्या-माया

बिनती सुनौ दीन की चित्त दै, कैसें तुव गुन गावै ?
माय नटी लकुटी कर लीन्हें कोटिक नाच नचावै ।
दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै ।
तुम सौं कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै ।
मन अभिलाश-तरंगनि करि करि, मिथ्या विसा जगावै ।
सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौ दिखाइ बौरावै ।
महा मोहनी मोहि आतमा, अपमारगहिं लगावै ।
ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै ।
मेरे तो तुम पति , तुमहिं गति, तुम समान को पावै ?
सूरदास प्रभु तुम्हरी कृपा बिनु, को मो दुख बिसरावै ॥1॥

हरि, तेरो भजन कियौ न जाइ ।
कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ ।
जबै आवौं साधु-संगति, कछुक मन ठहराइ ।
ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ ।
बेष धरि धरि हर्यौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ ।
जैसे नटवा लोभ -कारन करत स्वाँग बनाइ ।
करौं जतन, न भजौं तुमकों, कछुक मन उपजाई ।
सूर प्रभु की सबल माया. देति मोहि भुलाइ ॥2॥

गुरुमहिमा

गुरु बिनु ऐसी कौन करै ?
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै ।
भवसागर तैं बूड़त राखै, दीपक हाथ धरै ।
सूर स्याम गुरु ऐसौ समरथ, छिन मैं ले उधरै ॥1॥

नाम महिमा

हमारे निर्धन के धन राम
चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम ।
जल नहिं बूड़त अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम ।
बैकुँठनाथ सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥1॥

बड़ी है राम नाम की ओट ।
सरन गऐं प्रभु काढ़ि देत नहिं, करत कृपा कैं कोट ।
बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट ?
सूरदास पारस के परसैं मिटति लोह की खोट ॥2॥

जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ ।
सो सुख होत न जप-तप कीन्हैं, कोटिक तीरथ न्हाऐँ ।
दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाऐँ ।
तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नंद-नँदन उर आऐं ।
बंसीबट, बृंदावन, जमुना, तजि बैकुँठ न जावै ।
सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल-आवै ॥3॥

बंदों चरन-सरोज तिहारे ।
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे ।
जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैं नहिं टारे ।
जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मनबच-क्रम प्रहलाद सँभारे ।
जे पद-पदुम-परस-जल-पावन सुरसरि-दरस कटत अब भारे ।
जे पद-पदम-परस रिषि-पतिनी बलि, नृग, व्याध, पतित बहु तारे ।
जे पद-पदुम रमत बृंदावन अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे ।
जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि सरबस दै, सुत-सदन बिसारे ।
जे पद-पदुम रमत पांडव-दल दूत भए, सब काज सँवारे ।
सूरदास तेई पद-पंकज त्रिबिध-ताप-दुख-हरन हमारे ॥4॥

अब कैं राखि लेहु भगवान ।
हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान ।
ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान ।
दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह, कौन उबारे प्रान ?
सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान ।
सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥5॥

आछौ गात अकारथ गार्यौ ।
करीन प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हार्यौ ।
निसि दिन विषय-बिलासिन बिलसत, फूट गईं तब चार्यौ ।
अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन दई कौ मार्यौ ।
कामी, कृपन;कुचील, कुडरसन, को न कृपा करि तार्यौ ।
तातैं कहत दयाल देव-मनि, काहैं सूर बिसार्यौ ॥6॥

तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत ।
लालच लागिकोटि देवन के, फिरत कपाटनि खोलत ।
जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहिं लगि यह प्रीति ।
फलमाँगत फिरि जात मुकर ह्वै यह देवन की रीति ।
एकनि कौं जिय-बलि दै पूजै, पूजत नैंकु न तूठे ।
तब पहिचानि सबनि कौं छाँड़े नख-सिख लौं सब झूठे ।
कंचन मनि तजि काँचहिं सैंतत, या माया के लीन्हे !
तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक ।
सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ॥7॥

आजु हौं एक-एक करि टरिहौं ।
कै तुमहीं, कै हमहीं माधौ, अपने भरोसैं लरिहौं ।
हौं पतित सात पीढ़नि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं ।
अब हौं उघरि नच्यौ चाहत हौं, तुम्हैं बिरद बिन करिहौं ।
कत अपनी परतीति नसावत , मैं पायौ हरि हीरा ।
सूर पतित तबहीं उठहै, प्रभु जब हँसि दैहौ बीरा ॥8॥

प्रभु हौं सब पतितन कौ टीकौ ।
और पतित सब दिवस चारि के, हौं तौ जनमत ही कौ ।
बधिक अजामिल गनिका तारी और पूतना ही कौ ।
मोहिं छाँड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यौं जी कौ ।
कोऊ न समरथ अघ करिबे कौं, खैंचि कहत हौं लीको ।
मरियत लाज सूर पतितन में, मोहुँ तैं को नीकौ ! ॥9॥

अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल ।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल ॥
महामोह के नुपूर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल ।
भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल ।
तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल ।
माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल ।
कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नँदलाल ॥10॥

हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ ।
समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ ।
इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ ।
इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ ।
जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै. गंगा नाम परौ ।
तन माया, ज्यौं ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ ॥
कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥11॥

भगवदाश्रम

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै ।
जैसें उड़ि जहाज को पच्छी; फिरि जहाज पर आवै ।
कलम-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौं ध्वावै ॥
परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै ।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै ।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥1॥

हमैं नँदनंदन मोल लिये ।
जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किये ।
भाल तिलक, स्रबननि तुलसीदल, मेटे अंक बिये ।
मूँड्यौ मूँड़, कंठ बनमाला, मुद्रा चक्र दिये ।
सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये ।
सूरदास कों और बड़ौ सुख, जूठनि खाइ जिये ॥2॥

राखौ पति गिरिवर गिरि-धारी !
अब तौ नाथ, रह्यौ कछु नाहिन, उघरत माथ अनाथ पुकारी ।
बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रोन-करन व्रतधारी ।
कहि न सकत कोउ बात बदन पर, इन पतितनि मो अपति बिचारी ।
पाँडु-कुमार पवन से डोलत, भीम गदा कर तैं महि डारी ।
रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरम-सुत धरनी हारी ।
अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंद-मुरारी ।
सूरदास अवसर के चूकैं फिरि पछितैहौ देखि उघारी ॥3॥

Leave a Reply