विदा के बाद : प्रतीक्षा-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

विदा के बाद : प्रतीक्षा-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

परदे हटाकर करीने से
रोशनदान खोलकर
कमरे का फ़र्नीचर सजाकर
और स्वागत के शब्दों को तोलकर
टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ
और देखता रहता हूँ मैं।

सड़कों पर धूप चिलचिलाती है
चिड़िया तक दिखायी नहीं देती
पिघले तारकोल में
हवा तक चिपक जाती है बहती-बहती,
किन्तु इस गर्मी के विषय में किसी से
एक शब्द नहीं कहता हूँ मैं।

सिर्फ़ कल्पनाओं से
सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ
जन्म लिया करता है जो (ऐसे हालात में)
उसके बारे में सोचता हूँ
कितनी अजीब बात है कि आज भी
प्रतीक्षा सहता हूँ मैं।

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