विजय-विभूति-बीर छन्द -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

विजय-विभूति-बीर छन्द -पवित्र पर्व -अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’’-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

 

तेजमान हो जाय तेजहत पल-पल पाकर तेज अपार;
अंधीभूत अवनि पर होवे ज्योति-पुंज का प्रबल प्रसार।
महिमा-हीन बने महिमामय, मिले लोक का विभव महान;
होकर सबल अबल बन जाये प्रबल प्रभंजन-तनय-समान।
मिले लोक-बल जन कर पावे पार परम-दुख-पारावार;
रोके पंथ चूर हो जावे पर्वत सहकर प्रबल प्रहार।
सेतु आपदा-सरि का होवे कल कौशल घन पटल समीर;
बने बीर रिपु वन दावानल कूटनीति पावकता नीर।
हो न सभीत पुरंदर-पवि से, कंपित कर पावे न पिनाक;
विचलित हो न समर में कोई महाकाल की भी सुन हाँक।
जीवनमय जनता-जीवन हो, कर्म योगमय हो सब योग;
किसी पियूष-पाणि से होवे दूर जाति-जर्जर-तन-रोग।
सब के उर में भाव जगे वह, जो हो कार्य-सिध्दि का यंत्र;
हो स्वतंत्रताओं का साधान, सधे साधाने से जो मंत्र।
भरत-सुअन-उर में भर जाये अभयंकरी अतुल अनुभूति;
भूतिमान भारत बन जाये ले विजया से विजय-विभूति।

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