विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

दिशाहीन जग, भ्रमित विचरता,
ह्रदय भरा विष क्यों है रहता?
क्या आखिर जग की मजबूरी-
बढ़ती जाती पल -पल दूरी,
धरा अस्त्र से भरने को है,
क्यों फिर विश्व बिखरने को है?
कहे विश्व न कहे हमारा देश कहेगा,
विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा।

विश्व विजय की सबकी चाहत,
मौन सभ्यताएँ हो आहत,
उत्कंठा बल दिखलाने की,
सकल धरा पर भी छाने की,
बचे न जग का कोई कोना,
जग पाने में क्यों जग खोना?
तक्षशिला, नालंदा का अवशेष कहेगा,
विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा।

आतंकी साये में धरती,
शान्ति कहीं छुप आहें भरती,
हिंसा का दृढ़ पारावार,
लोहित दिखता है संसार,
कौन कहाँ जीवन खोएगा,
चिता सजी, जग कब सोएगा?
स्वर्णिम लंका जलती क्यों लंकेश कहेगा,
विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा।

फैल रहा प्रतिपल तिमिरांचल,
वारिधि, नभ, गिरि या भू समतल,
संस्कृति, शील, सुजन का परिभव,
तीव्र प्रभंजन में दीपक लौ,
बर्बरता का नर अभिलाषी,
मानवता शोणित की प्यासी।
मिट्टी में मिल सृष्टि सकल का शेष कहेगा,
विचलित नर को गीता का संदेश कहेगा।

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