वारदात-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

वारदात-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

दो बजने में आठ मिनट थे–
जब वह भारी बोरियों जैसी टांगों से बिल्डिंग
की छत पर पहुँचा था
थोड़ी देर को छत के फर्श पर बैठ ग़या था

छत पर एक कबाड़ी घर था,
सूखा सुकड़ा तिल्ले वाला, सूद निचोडू जागीरे,
का जूता वो पहचानता था,
इस बिल्डिंग में जिसका जो सामान मरा, बेकार
हुआ, वो ऊपर ला के फेंक गया!

उसके पास तो कितना कुछ था,–
कितना कुछ जो टूट चुका है, टूट रहा है–
शौहर और वतन की छोड़ी हमशीरा कल पाकिस्तान
से बच्चे लेकर लौट आई है!
सब के सब कुछ खाली बोतलों डिब्बों जैसे लगते हैं,
चिब्बे, पिचके, बिन लेबल के!
सुबह भी देखा तो बूढी दादी सोयी हुई थी,–
मरी नहीं थी!
जब दोपहर को, पानी पी कर, छत पर आया था
वो तब भी ,
मरी नहीं थी, सोयी हुई थी!
जी चाहा उसको भी ला कर छत पे फेंक दे,
जैसे टूटे एक पलंग की पुश्त पड़ी है!

दूर किसी घड़ियाल ने साढ़े चार बजाये,
दो बजने में आठ मिनट थे, जब वो छत पर आया था!
सीढियाँ चढ़ते चढ़ते उसने सोच लिया था,
जब उस पार “ट्रैफिक लाइट” बदलेगी
रुक जायेंगी सारी कारें,
तब वो पानी की टंकी के उपर चढ के, “पैरापेट” पर
उतरेगा, और —
चौदहवीं मंजिल से कूदेगा!
उसके बाद अँधेरे का इक वक़फा होगा!
क्या वो गिरते गिरते आँखें बंद कर लेगा?
या आँखें कुछ और ज्यादा फट जायेंगी?
या बस—— सब कुछ बुझ जायेगा?
गिरते गिरते भी उसने लोगों का इक कोहराम सुना!
और लहू के छीटें, उड़ कर पोपट की दूकान
के ऊपर तक भी जाते देख लिये थे!

रात का एक बजा था जब वह सीढियों से
फिर नीचे उतरा,
और देखा फुटपाथ पे आ कर,
‘चॉक’ से खींचा, लाश का नक्शा वहीँ पड़ा था,
जिसको उसने छत के एक कबाड़ी घर से फेंका था–!!

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