वाबस्तगी-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

वाबस्तगी-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

आ गई फिर वही पहाड़-सी रात
दोश पर हिज्र की सलीब लिए
हर सितारा हलाके-सुबहे-तलब
मंज़िले-ख़्वाहिशे-हबीब लिए

इससे पहले भी शामे-वस्ल के बाद
कारवाँ-ए-दिलो-निगाह चला
अपनी-अपनी सलीब उठाए हुए
हर कोई सू-ए-क़त्लगाह चला चला

कितनी बाहों की टहनियाँ टूटीं
कितने होंठों के फूल चाक हुए
कितनी आँखों से छिन गए मोती
कितने चहरों के रंग ख़ाक हुए

फिर भी वीराँ नहीं है कू-ए-मुराद,
फिर भी शब ज़िंदादार हैं ज़िंदा
फिर भी रौशन है बज़्मे-रस्मे-वफ़ा
फिर भी हैं कुछ चराग़ ताबिंदा

वही क़ातिल जो अपने हाथों से
हर मसीहा को दार करते हैं
फिर उसी की मुराज़अत के लिए
हश्र तक इंतज़ार करते हैं

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