वादे की रात मरहबा, आमदे-यार मेहरबाँ-गुल-ए-नग़मा-फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

वादे की रात मरहबा, आमदे-यार मेहरबाँ-गुल-ए-नग़मा-फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

वादे की रात मरहबा, आमदे-यार मेहरबाँ
जुल्फ़े-सियाह शबफ़शाँ, आरिजे़-नाज़ महचकाँ।

बर्क़े-जमाल में तेरी, ख़ुफ़्ता सुकूने-बेकराँ
और मेरा दिले-तपाँ, आज भी है तपाँ-तपाँ।

शाम भी थी धुआँ-धुआँ हुस्न भी था उदास-उदास
याद सी आके रह गईं दिल को कई कहानियाँ।

छेड़ के दास्ताने-ग़म, अहले-वतन के दरम्याँ
हम अभी बीच में ही थे और बदल गई जवाँ।

अपनी ग़ज़ल में हम जिसे कहते रहे हैं बारहा
वो तेरी दास्ताँ कहाँ वो तो है ज़ेबे-दास्ताँ।

कोई न कोई बात है, उसके सुकूते-यास में
भूल गया है सब गिले, आज तो इश्के़-बदगु़मा।

रात कमाल कर गईं, आलमे-कर्बो-दर्द में
दिल को मेरे सुला गईं तेरी नज़र की लोरियाँ।

सरहदे-ग़ैब तक तुझे, साफ़ मिलेंगे नक़्शे-पा
पूँछ न ये फिरा हूँ मैं तेरे लिये कहाँ-कहाँ।

कहते हैं मेरी मौत पर उसको भी छीन ही लिया
इश्क़ को मुद्दतों के बाद एक मिला था तर्जुमाँ।

रंग जमा के उठ गई कितने तमद्दुनो की बज़्म
याद नहीं ज़मीन को, भूल चुका है आसमाँ।

आर्ज़ियत का सोज भी देख तो सोजे-आर्ज़ी
बीते हुये जुगों से पूँछ किसको सबात है कहाँ।

कोई नहीं जो साथ दे तेरे हरीमे-राज़ तक
बिख़रे हुये महो-नुजूम, देते हैं सब तेरा निशाँ।

जिसको भी देखिये वही बज़्म में है ग़ज़लसरा
छिड़ गई दास्ताने-दिल, फिर बहदीसे-दीगराँ।

बीत गये हैं लाख जुग, सूये-वतन चले हुये
पहुँची है आदमी की जात, चार कदम कशाँ-कशाँ।

पाँव से फ़र्के-नाज़ तक बर्क़े-तबस्सुमे-निशात
हुस्ने-चमनफ़रोश को देख जहाँ है गुलसिताँ।

दादे-सुखनवरी मिली अबरू-ए-नाज़ उठ गये
है वही दास्ताने-दिल हुस्न भी कह उठे कि हाँ।

जैसे खिला हुआ गुलाब चाँद के पास लहलहाये
रात वह दस्ते-नाज़ में जामे-निशात अरग़वाँ।

राज़े-वज़ूद कुछ न पूँछ, सुब्‍हे-अज़ल से आज तक
कितने यक़ीन चल बसे, कितने गुजर गये गुमाँ।

नर्गिसे-नाज़ मरहबा ज़द में है जिसकी कायनात
चुटकी में नावके-निगाह जुटी भवें कमाँ-कमाँ।

तुझ से यही कहेंगी क्या गुज़री है मुझ पर रात भर
जो मेरी आस्तीं प हैं तेरे ग़मों की सुर्खि़याँ।

हुस्ने-अज़ल की जल्वागाह आईना-ए-सुकूते-राज़
देख तो है अयाँ-अयाँ पूछ तो है नेहाँ-नेहाँ।

दूर बहुत ज़मीन से पहुँची है इक किरन की चोट
नीम तबस्सुमे-खफ़ी! रह गईं पिस के बिजलियाँ।

कितने तसव्वुरात के, कितने ही वारदात के
लालो-गुहर लुटा गया दिल है कि गंजे-शायगाँ।

सीनो में दर्द भर दिया छेड़ के दास्ताने-हुस्न
आज तो काम कर गई इश्क़ की उम्रे-रायगाँ।

आह फरेबे-रंगो-बू. अपनी शिकस्त आप है
बाद नज़ारा-ए-बहार, बढ़ गई और उदासियाँ।

ऐ मेरी शामे-इन्तेज़ार, कौन ये आ गया, लिये
ज़ुल्फो़ में एक शबे-दराज़, आँखों में कुछ कहानियाँ।

मुझको ’फ़िराक़’ याद है, पैकरे-रंगो-बू-ए-दोस्त
पाँव से ता-जबीने-नाज़, महरफ़शाँ-ओ-महचकाँ।

 

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