वह कुछ भी कर सकते हैं-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

वह कुछ भी कर सकते हैं-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

वह कुछ भी कर सकते हैं।
रांझे की वंशी से लेकर
कन्हैया की बाँसुरी तोड़ने तक।

मेरे सुरों को
कंठ में ही दफनाने से लेकर
साँसों को कशीदने तक।
खीझे हुए हैं
कुछ भी कर सकते हैं।

जुनून के बुख़ार में
इंसाफ का तराजू तोड़ कर
पलड़े को औंधे मुँह मार सकते हैं
कचहरियों में तारीख भुगतने आई
द्रोपदी का चीरहरण कर सकते हैं।

यह न कौरव हैं न पांडव।
यह ताण्डवपंथी
तमाशबीन हैं।
चिड़िया की मौत पर, गँवारों-सा हँसते हँसते
यह कुछ भी कर सकते हैं।

किसके वकील हैं यह?
जो न दलील सुनते हैं
न अपील बाँचते हैं।
नई नस्ल के महाबली
कौन सी भाषा/बोली बोलते हैं।
जो हमें भी सिखाना चाहते हैं।
तीर तलवार हथियार
मुँह में अगन
हर पल ही लगन
यह मनाने की ज़िद करते।
कि यह आर्यावत्र्त हमारा है
भारत देश हमारा।
बो रहे बेगानगी की फसल।
भूल गए हैं
बहुत मुश्किल होगी बाद में काटनी
बेविश्वासी की फ़सल।
यदि यह वतन
सिर्फ़ इनका है
तो हमारा कौन सा है?

जहाँ कुछ सुनिए कुछ कहिए की धुन सुनी।

सावधान!
यह कुर्सी के लिए
कुछ भी कर सकते हैं।
मर नहीं मार सकते हैं।
डुबोकर अस्थियाँ तार सकते हैं।
कुछ भी कर सकते हैं।

 

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