वही, वैसा ही-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar 

वही, वैसा ही-विंदा करंदीकर -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vinda Karandikar

 

सुबह से रात तक
वही, वही! वैसा ही!

बन्दरछाप दन्तमंजन;
वही चाय, वही रंजन;
वे ही गाने, वे ही तराने;
वे ही मूर्ख, वे ही सयाने;
सुबह से रात तक
वही, वही! वैसा ही!

भोजनघर भी बदलकर देखे;
(जीभ बदलना सम्भव नहीं था!)
‘चाची’ हो या ‘ताजमहल’
सबका हाल एक सा था।
नरम मसाला, गरम मसाला;
वही वही साग सब्जी;
वही बदबूदार चटनी;
वही, वैसा ही खट्टा रसा;
दुख बहुत, सुख ज़रा सा!

संसार के बरगद पर
स्वप्नों के चमगादड़
इन स्वप्नों के शिल्पकार
कवि कम, ज्यादा तुकबन्दक!
परदे पर की उछलकूद
शोक बासी, चुटकुला नपुंसक;
भ्रष्ट कथा, नष्ट बोध;
नौ धागे, एक रंग;
व्यभिचार के सारे ढंग!

बार बार वे ही भोग;
आसक्ति का वही रोग।
वही मन्दिर, वही ‘मूर्ति’;
वे ही ‘फूल’, वही ‘स्फूर्ति’;

वे ही होठ, वे ही आँखें;
वे ही लटके, वे ही नखरे;
‘वही पलंग’, वही ‘नारी’;
-सितार नहीं, इकतारी!

करनी चाही आत्महत्या;
रोमियो की आत्महत्या;
दधीचि की आत्महत्या!
आत्महत्या भी वही!
आत्मा भी वही;
हत्या भी वही:
क्योंकि जीवन भी वही!
और मरण भी वही!

(अनुवाद : स्मिता दात्ये)

 

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