वर्षों से यह रास्ता वीरान क्यों है?-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

वर्षों से यह रास्ता वीरान क्यों है?-प्रहरी : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

जिस राह पर हम चल-चलके थक गये,
उसके मोड़ों से अब भी अनजान क्यों हैं?

बड़े – बड़े शिक्षण संस्थान खुले शहरों में,
पर लगते कुछ ऊँची दुकान क्यों हैं?

सपनों को चुन-चुन जलाये मिटाने को,
अब भी सुलगते कुछ अरमान क्यों हैं?

शोहरत , शौकत, शान सब कुछ,
फिर, आदमी से महँगा सामान क्यों है?

घटायें उमड़ रहीं धरती बहाने के लिए,
तब भी झुलसता आसमान क्यों है?

खून का कतरा – कतरा दिया देश को,
फिर विवश – सा लगता जवान क्यों है?

यूँ तो बिकता रहा आदमी हर युग में,
आज बिकता हुआ शील, ईमान क्यों है?

ज्ञान बढ़ा, हम गये चाँद पर भी,
आज धरती पर मानव नादान क्यों है?

हर तरफ उत्पात, क्रूरता, शील-हनन,
छुप – छुपकर देखता भगवान् क्यों है?

फिरंगी छोड़ गये देश बरसों पहले
अब अपनों से लुटता हिन्दुस्तान क्यों है?
वर्षों से यह रास्ता वीरान क्यों है?

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