वर्षा-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड तीन-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar
दिन भर वर्षा हुई
कल न उजाला दिखा
अकेला रहा
तुम्हें ताकता अपलक |
आती रही याद :
इंद्रधनुषों की वे सतरंगी छवियाँ
खिंची रहीं जो
मानस-पट पर भरसक |
कलम हाथ में लेकर
बूँदों से बचने की चेष्टा की–
इधर-उधर को भागा
भींग गया पर मस्तक :
हाय ! भाग्य की रेखा,
मुझ पर ही आकाश अकारण बरसा
पर तुम…
बूँदें गई न शायद तुम तक |