वरदान-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal 

वरदान-छोटा सा आकाश-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

वे दिन भी कितने अच्छे थे
जब कहीं दूर साथ तुम्हारे जाते
बातों से ही नाप लेते जीवन की परिधि
थक कर फिर तुम्हे बाँहों में सुला लेते

हम दोनों, कभी गर्म प्याले के बीच
तो कभी जी लेते कुछ बहाने से
तुम्हारे दफ्तर में कुछ पल बीत जाते
फिर लौट आते अपने वीराने में

तुम्हारी हर दिन प्रतीक्षा रहती
मन गुब्बारा होता जब तुम खिड़की पर आती
तुम्हारी गोद में सर रख कर खो जाते
तुम्हे देखते, न जाने कब शाम घिर आती

कभी तुम्हारे बालों को सहलाते
छू लेते अधरों का तपन
आभास होता कभी मृदु क्षीर श्रृंग का
तुम नीड़ बनी, अमरबेल बना यह जीवन

तुम ही प्राची, तुम ही प्रभा हो
अरुण कमल सी लिये मुस्कान
कितनी सुन्दर सजीव आभरण हो
हे भगवन ! तुमसे और कैसा मांगूं वरदान

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