वन की होली-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

वन की होली-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

ऐसा लगा मानो धू-धू कर के आग जल रही हो,
टोलों पर शेरों की जोड़ी छलाँग लगाती निकली हो;
किंशुक के प्राचीन रक्त से फागुन लाल हो गया है,
प्रकृति की यह कैसी आकांक्षा ! सुन्दर को मृत्यु से यह कैसा अनुराग है !

शाल और सागौन शीशम और गम्भार के बीच
सरकारी वन में यह किन की चेतना जागती है, कौन अंगड़ाई ले रहे है !
चाँद के इस तीव्र रूप के सम्भार से
निष्ठुर करुण गोखुरे और चन्द्रबोड़ा साँप ।

फिर भी पेड़ों पर मृदुल फूलों की गन्ध है,
झाड़-झाड़ियों में चुपचाप घ्राण भर जाता है,
हरेक पक्षी से आँख-कानों में चकाचौंध हो जाती है,
हिरन की पुकार की प्रकट पुलक में मृत्यु का सम्मान है।

यह मानो देश के लोगों की प्रकृत उपमा है
जो स्मति की मार से आशा-आनन्द में भी खिन्न रहते हैं,
मानो अपने प्रेम के कारण ही वे एक-दूसरे को घृणित मानने को बाध्य हों,-
क्या सचमुच समाज में ही प्रकृति की मृत तुलना मिलती है ?

ऐसा लगा मानो रात में पहाड़ों पर अग्निमालाएँ नाच रही हों,
न जाने कितने जलती आँखों वाले पैरों की चाप सुनाई दी,
इधर दूर की उस बस्ती में फागुन मतवाला हो उठा है,
नगाड़े और बाँसुरी के स्वरों से पूर्णिमा सारी रात प्रेम में मिटाती-बनाती है ॥

१९५८

 

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