वज़्द-व-हाल-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

वज़्द-व-हाल-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

क्या इल्म उन्होंने सीख लिया, जो बिन लिक्खे बांचे हैं।
और बात नहीं मुंह से निकले बिन होंठ हिलाये जाचे हैं॥
दिल उनके तार सितारों के तन उनके तबल तमाचे हैं।
मुंह चंग ज़बां, दिल सारंगी, पा घुंघरू हाथ कमाचे हैं।
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥1॥

कुल बाजे बजकर टूट गए आवाज़ लगी जब भर्राने।
और छम-छम घुंघरू बंद हुए तब गत का अंत लगे पाने॥
संगीत नहीं यह संगत हैं नटवे भी जिससे नट मानें।
यह नाच कोई क्या पहचाने, इस नाच को नाचे सो जाने॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥2॥

जब हाथ को धोया हाथों से जब हाथ लगे थिरकाने को।
और पांव को खींचा पावों से, जब पांव लगे गत पाने को॥
जब आंख उठाई हंसने से, जब नैन लगे मटकाने को।
सब छाछ कछे, सब नाच नचे, उस रसिया छैल रिझाने को॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥3॥

जो आग जिगर में भड़की है, उस शोले की उजियाली है।
जो मुंह पर हुस्न की ज़र्दी है, उस ज़र्दी की सब लाली है॥
जिस गत पर उसका पांव पड़ा, उस गत की चाल निराली है।
जिस मजलिस में वह नाचे हैं, वह मजलिस सबसे खाली है॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥4॥

सब घटना बढ़ना फेंक अधर और ध्यान उधर धर मरते हैं।
बिन तारों तार मिलाते हैं, जब निरत निराला करते हैं॥
बिन गहने झमक दिखाते हैं, बिन जोड़े मन को हरते हैं।
बिन हाथों भाव बताते हैं, बिन पांव खड़े गत भरते हैं॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥5॥

था जिसका ख़ातिर नाच नचा, जब सूरत उनकी आय गई।
कहीं आप कहा, कहीं नाच किया और तान कहीं लहराय गई॥
जब छैल छबीले सुन्दर की, छबि नैनन अन्दर छाय गई।
एक मूर्छा गत सी आय गई, और जोत में जोत समाय गई॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥6॥

सब होश बदन का दूर हुआ, जब गत पर आ मरदंग बजी।
तन भंग हुआ, दिल दंग हुआ, सब आन गई बे आन सजी॥
यह नाचा कोई ‘नज़ीर’ अब यां औ किसने देखा नाच अजी।
जब बंद मिली जा दरिया में, इस तान का आखि़र निकला जी॥
हैं राग उन्हीं के रंग भरे और भाव उन्हीं के सांचे हैं।
जो बेगत, बे सुर ताल हुए, बिन ताल पखावज नाचे हैं॥7॥

 

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