लोहा पथर के घरों वाले-डॉ. अमरजीत टांडा-Dr. Amarjit Tanda -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

लोहा पथर के घरों वाले-डॉ. अमरजीत टांडा-Dr. Amarjit Tanda -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita,

लोहा पथर के घरों वाले
कांप रहे हैं
ज़रा सा बादल कया गरजा
आसमान ने आंख झंपकी है ज़रा सी

झोपड़ी नाच ऊठी है
गर्मी कम होगी
सांस लेंगे दो पल ठंडक में

कपड़ों का क्या है
पहले पसीने से भीगे थे
अब बारस से
साफ भी हो जांएगे ठंडे भी

बस्तियों में से धुयाँ
निकलता तो है
जब कभी रोटी पकती है
पेट भरता है ईशायों का
अगले दिन के अरमानों का

हरा सा हो जाऐगे
हमारा सूखा सा सभी चुफेर
डालीयों को पत्ते फूल मिलेंगे
सुलझ जाएगा कुछ
जिंदगी के ऊलझे से धागे

इच्छाएँ शहर की
संबर जाऐंगी
यहाँ हर दर्पण एक है
चेहरे बदलते हैं हर रोज

मेरे सुलगते क्षण भी
दिख जाऐंगे
इस बिजली की चमक में

अब मुझे जाने दो
सपना लेना है जंजीरों का
उनके राग ताल का

सुनी है तो बताईऐ
कैसे छनकती है बेड़ी पायों में
क्या तर्ज होती है
हाथों में पहनी हुई हथकड़ियों की

 

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