लोकतंत्र के मुंह पर ताला-इस गुब्बारे की छाया में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

लोकतंत्र के मुंह पर ताला-इस गुब्बारे की छाया में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

लोकतंत्र के मुँह पे ताला
द्वारे पर मकड़ी का जाला
बैठ गया है अफसर आला
पगलों से पड़ना था पाला

कहीं दाल है पानी-पानी
कहीं दाल में काला-काला
लोकतंत्र के मुंह पर ताला

कहीं दलाली कहीं घुटाला
मनके बिखरे टूटी माला
जपते थे जनतंत्री माला
नाना जी ने संकट पाला
उल्लू तक वरदान पा गए
तकरीरों का खुला पनाला
कहीं दलाली कहीं घुटाला

शरम नहीं है, लाज नहीं है
काम नहीं है, काज नहीं है
रॉयल्टी है राज नहीं है
पुरखों की आवाज नहीं है
गूंज भर गई है खोखल में
फिर भी आता बाज नहीं है
शरम नहीं है, लाज नहीं है।

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