लै ही रहे हौ सदा मन और कौ-सुजानहित -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand 

लै ही रहे हौ सदा मन और कौ-सुजानहित -घनानंद-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ghananand

लै ही रहे हौ सदा मन और कौ, दैबौ न जानत जानदुलारे।
देख्यौ न है सपने हूं कहूं दुखं, त्यागे सकोच औ सोच सुखारे।
कैसौ संयोग वियोग धौ आहि, फिरौ घन आनंद हवै मतवारे।
मो गति बूझि परै तबहि जब होहु घरीक लौ आपु ते न्यारे।

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