लुहार से-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

लुहार से-गीत-फ़रोश-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

मुझे एक तलवार बना दे,
हवा की जो लहरों पर दौड़े
इतनी हल्की धार बना दे ।

लंबाई उसकी कितनी हो ?
पूरी बढ़ी फसल गेहूँ की
बढ़ते-बढ़ते तक जितनी हो;

और लचीली तेज साँप-सी,
सौ-सौ आँखों वाली बिजली की
तड़पन, बे-वक़्त काँप-सी;

चिकनी हो, रेशम काले-सी
पतली हो, ठहरो, पतली हो–
मकड़ी के फैले जाले-सी;

और दर्द या शीत सरीखी,
हो बे-दर्द, चढ़ाते सूली
जल्लादों के गीत सरीखी ;

मूठ बनाते चित्र खींच दे
थके हुए भूखे किसान का
उस पर माँ का प्यार सींच दे ।
(अगस्त, 1937)

 

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