लाहूत पर न देखें जो क़ुदसियाँ तमाशा-इंशा अल्ला खाँ ‘इंशा’ -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Insha Allah Khan Insha

लाहूत पर न देखें जो क़ुदसियाँ तमाशा-इंशा अल्ला खाँ ‘इंशा’ -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Insha Allah Khan Insha

लाहूत पर न देखें जो क़ुदसियाँ तमाशा
सो हम को है दिखाता इश्क़-ए-बुताँ तमाशा

टुक कीजे चश्म-ए-दिल से याँ सैर मय-कदे की
हैगा अजब मज़े का पीर-ए-मुग़ाँ तमाशा

जिस ने सुने ये मेरे अशआ’र ख़ुश हो बोला
नाम-ए-ख़ुदा है तो कुछ ऐ नौजवाँ तमाशा

अल्लाह री फ़साहत अल्लाह री बलाग़त
ऐसा कहाँ झमकड़ा ऐसा कहाँ तमाशा

शोख़ी अदा सो ऐसी जोश-ओ-ख़रोश इतना
बंदिश धुआँ सो ये और तर्ज़-ए-बयाँ तमाशा

दीवान सैंकड़ों हैं हम ने तो देखे लेकिन
इन में नज़र पड़ा कब पाया जो याँ तमाशा

क्या ख़ूब वाह माशा-अल्लाह है अजब कुछ
दीवान-ए-मीर इन्शाअल्लाह ख़ाँ तमाशा

 

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