लम्बी उम्र इकट्ठे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

लम्बी उम्र इकट्ठे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

तूने पूछा है मेरे बेटे!
माँ री माँ,
सारी उम्र इकट्ठे रहना।
कैसे गढ़ा रूह का गहना।

बात तो बड़ी आसान-सी है।
पर तुझे यह नहीं समझ में आनी है।
मैं और तेरा बाबुल दोनों,
उस वक्त के जन्मे जाये।
राह में जिसके काँटे आए।
मिलकर हम दोनों ने हटाए।

मेरा कमरा तेरा कमरा,
तब यह रोग नहीं था।
तेरी नानी तेरी दादी,
दोनों थीं इस घर की माँएँ।
शिखर दोपहरी सिर पर साये।
जो भी टूटता गाँठ लेते थे।
प्यार मुहब्बत बाँट लेते थे।
रूठता एक मनाता दूजा।
घर मंदिर में यूं करते पूजा।
टूटा जोड़ने में ही
उम्र गुज़ारी सारी।
अब भी सफ़र
कभी लगा नहीं
रूह को भारी।
कपड़े को जो खोंच लगती
मैं सिल लेती।
घर में बर्तन खड़के तो
गैरों ने सुना नहीं।

मेरी मम्मी तेरी मम्मी
मेरा डैडी तेरा डैडी
यह तो वायरस नया नया है।
उस समय तो एक थी धरती,
एक मात्र ही था सिर पर अंबर।

अब तो बर्तन बिन खड़के जाते हैं टूट।
एक दूसरे संग टकराना
रूह से अलग अलग रहना।
टूटना और बाद में
टुकड़े चुगते रहना।
इस रोग का नाम न कोई।

अपने मन में जो रस होवे
रिश्तों में खु़शबू होवे।
एक सपने में रंग यदि भरिए,
यह जीवन महकों का मेला।
मोह का सागर यदि बन जाए भवसागर,
तैरना लगता है तब अति दुष्कर।

 

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