रे नर इह साची जीअ धारि- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

रे नर इह साची जीअ धारि- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

रे नर इह साची जीअ धारि ॥
सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बार ॥1॥रहाउ॥
बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नही दिन चारि ॥
तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गवार ॥1॥
अजहू समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि ॥
कहु नानक निज मतु साधन कउ भाखिओ तोहि पुकारि ॥2॥8॥633॥

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