रेडियम की छाया-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

रेडियम की छाया-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

सूनी आधी रात
चांद-कटोरे की सिकुड़ी कोरों से
मन्द चाँदनी पीता लम्बा कुहरा
सिमट लिपट कर ।

दूर-दूर के छाँह-भरे सुनसान पथों में
चलने की आहट ओले-सी जमी पड़ी थी
भूरे पेड़ों का कम्पन भी ठिठुर गया था
कभी-कमी बस
पतझर का सूखा पत्ता गिर कर उड़ जाता
मरे स्वरों से खर-खर करता ।
प्रथम मिलन के उस ठण्डे कमरे में
छत के वातायन से
नींद-भरी मन्दी-सी एक किरन भी
थक कर लौट-लौट जाती थी
आलस-भरे अंधेरे में
दो काली आँखों-सी चमकीली
एक रेडियम घड़ी सुप्त कोने में चलती
सूनेपन के हल्के स्वर-सी ।
उन्हीं रेडियम के अंकों की लघु छाया पर
दो छाँहों का वह चुपचाप मिलन था
उसी रेडियम की हल्की छाया में
चुपके का वह रुका हुआ चुम्बन अंकित था
कमरे की सारी छाँहों के हल्के स्वर-सा
पड़ती थीं जो एक दूसरे में मिल-गुंथ कर ।
सूनी-सी उस आधी रात ।

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