रुबाईयात- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

रुबाईयात- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab
फ़ुरसत में याद करना छोड़ दे
नग़मे सोज़ के गाना छोड़ दे
फिर भी न माने दिल अगर तो
दिल के तारों को ही तू तोड़ दे

 

आंखों में जब तुम हो समाये
दिगर मजाल किसकी सनम जो आये
लाख हसीं हुआ करे कोई
तुम बिन ज़ालिमा न अब कोई भाये

 

फिर हलचल मचाने ये कौन आ रहा है
बेदर्दी लुटेरा ये कौन आ रहा है
यूं फ़रश-ए-दिल पे ख़रामां ख़रामां
ये कौन आ रहा है, ये कौन आ रहा है

 

तुझको अब ये ज़हर पीना पड़ेगा
उसके बगैर अब जीना पड़ेगा
ये है मशक-ए-वफ़ा दिल-ए-नादां
गिरेबां चाक को सीना पड़ेगा

 

 

किस बला के हसीन नज़र आते हो
मानिन्द-ए-माहताब नज़र आते हो
है तूफ़ान शायद आने वाला
तुम जो ख़ामोश नज़र आते हो

 

तू निगाहों के जाम लेके आ जा
मस्ती जो भी है तमाम ले के आ जा
प्यासे हैं हम इक उमर से हम साकी
ख़ुशी का कोई तो पैग़ाम लेके आ जा

 

 

क्या बतायूं कितने अरमां कुचल कर आ गए
हम जो यूं तेरी महफ़िल से निकल कर आ गए
मेरी आंखों से तो अचानक ख़ुद-ब-ख़ुद
कितने ही दरिया यूं उबल कर आ गए

 

तुझ बिन दिल बहलाना आ गया
हर ग़म अब भुलाना आ गया
ये न पूछो किस तरह
मुझको बस मुस्कराना आ गया

 

उनसे जुदा हुए अभी दो दिन हुए नहीं
लगता है यूं कभी बाहम जाने जिगर हुए नहीं
अभी से क्यों मरा जाता है ‘बेताब’ तू
मिल लेना दुश्मन जिन्दा हैं अभी मरे नहीं

 

 

गुनहगार मौसम के इशारे हैं
दिलनवाज़ शोख़ बेईमां नज़ारे हैं
क्या ज़ुल्म है सितम है कहर है ‘बेताब’
कम्बख़त तू नहीं और सारे हैं

 

उनसे उल्फ़त भी कोई उल्फ़त है
मुझ पे तारी ख़ुदाया ये कैसी वहशत है
उमर भर वह मेरे ही रहें फ़क्त मेरे ही
अजब ये अन्दाज़ है कैसी ये चाहत है

 

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