रुबाईयां-शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers  

रुबाईयां-शायरी-मिर्ज़ा ग़ालिब-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mirza Ghalib Poetry/shers

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कहते हैं कि अब वो मरदम-आज़ार नहीं
उशशाक की पुरसिश से उसे आर नहीं
जो हाथ कि ज़ुलम से उठाया होगा
कयोंकर मानूं कि उसमें तलवार नहीं

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हम गरचे बने सलाम करने वाले
कहते हैं दिरंग काम करने वाले
कहते हैं कहें खुदा से, अल्लाह अल्लाह
वो आप हैं सुबह शाम करने वाले

समाने-ख़ुरो-ख़्वाब कहां से लाऊं ?
आराम के असबाब कहां से लाऊं ?
रोज़ा मेरा ईमान है ”ग़ालिब” लेकिन
ख़स-ख़ाना-ओ-बरफ़ाब कहां से लाऊं?

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आतिशबाज़ी है जैसे शग़ले-अतफ़ाल
है सोज़े-ज़िगर का भी इसी तौर का हाल
था मूजीदे-इशक भी क्यामत कोई
लड़कों के लिए गया है क्या खेल निकाल

दिल था की जो जाने दर्द तमहीद सही
बेताबी-रशक व हसरते-दीद सही
हम और फ़सुरदन, ऐ तज़लली! अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही

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है ख़लक हसद कमाश लड़ने के लिए
वहशत-कदा-ए-तलाश लड़ने के लिए
यानी हर बार सूरते-कागज़े-बाद
मिलते हैं ये बदमाश लड़ने के लिए

दिल सख़त निज़नद हो गया है गोया
उससे गिलामन्द हो गया है गोया
पर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
”ग़ालिब” मुंह बन्द हो गया है गोया

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दुक्ख जी के पसन्द हो गया है ”ग़ालिब”
दिल रुककर बन्द हो गया है ”ग़ालिब”
वल्लाह कि शब को नींद आती ही नहीं
सोना सौगन्द हो गया है ”ग़ालिब”

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मुशकिल है ज़बस कलाम मेरा ऐ दिल!
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमायश
गोयम मुशकिल वगरना गोयम मुशकिल

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