रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 1

रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 1

चाल और भी दिल-नशीन हो जाती है

चाल और भी दिल-नशीन हो जाती है
फूलों की तरह ज़मीन हो जाती है
चलती हूँ जो साथ-साथ उनके तो सखी
खुद चाल मेरी हसीन हो जाती है

आहट मेरे कदमों की जो सुन पाई है

आहट मेरे कदमों की जो सुन पाई है
इक बिजली सी तन-बदन में लहराई है
दौड़ी है हरेक बात की सुध बिसरा के
रोटी जलती तवे पर छोड़ आई है

जज़्बों की गिरह खोल रही हो जैसे

जज़्बों की गिरह खोल रही हो जैसे
अल्फ़ाज़ में रस घोल रही हो जैसे
अब शेर जो लिखता हूँ तो यूँ लगता है
तुम पास खड़ी बोल रही हो जैसे

आँचल ही नहीं जिस्म भी लहराया है

आँचल ही नहीं जिस्म भी लहराया है
आँखों में क़यामत का नशा छाया है
वो दूर हैं, फिर सखी ये क़िस्सा क्या है ?
“कल शाम वो आ रहे हैं, खत आया है”

जीवन की ये छाई हुई अंधयारी रात

जीवन की ये छाई हुई अंधयारी रात
क्या जानिए किस मोड़ पे छूटा तेरा साथ
फिरता हूँ डगर- डगर अकेला लेकिन
शाने पे मेरे आज तलक है तेरा हाथ

इक बार गले से उनके लगकर रो ले

इक बार गले से उनके लगकर रो ले
जाने को खड़े हैं उनसे क्या बोले
जज़्बात से घुट के रह गई है आवाज़
किस तरह से आँसुओं के फंदे खोले

डाली की तरह चाल लचक उठती है

डाली की तरह चाल लचक उठती है
ख़ुशबू से हर इक साँस छलक उठती है
जूड़े में जो वो फूल लगा देते हैं
अंदर से मेरी रूह महक उठती है

इक रूप नया आप में पाती हूँ सखी

इक रूप नया आप में पाती हूँ सखी
अपने को बदलती नज़र आती हूँ सखी
ख़ुद मुझको मेरे हाथ हसीं लगते हैं
बच्चे का जो पालना हिलाती हूँ सखी

तू देश के महके हुए आँचल में पली

तू देश के महके हुए आँचल में पली
हर सोच है ख़ुश्बुओं के साँचे में ढली
हाथों को जोड़ने का ये दिलकश अंदाज़
डाली पे कंवल के जिस तरह बंद कली

कपड़ों को समेटे हुए उट्ठी है मगर

कपड़ों को समेटे हुए उट्ठी है मगर
डरती है कहीं उनको न हो जाए ख़बर
थक कर अभी सोए हैं कहीं जाग न जाएँ
धीरे से उढ़ा रही है उनको चादर

कहती है इतना न करो तुम इसरार

कहती है इतना न करो तुम इसरार
गिर जाऊँगी ख़ुद अपनी नज़र से इक बार
ऐसी तुम्हें ज़िद है तो इस प्याले में
मेरे लिए सिर्फ छोड़ देना इक प्यार

तेरे लिये बेताब हैं अरमाँ कैसे

तेरे लिये बेताब हैं अरमाँ कैसे
दर आ मेरे सीने में किसी दिन ऐसे
भगवान कृष्ण की सजी मूरत में
चुपचाप समा गई थी मीरा जैसे

गाती हुई हाथों में ये सिंगर की मशीन

गाती हुई हाथों में ये सिंगर की मशीन
क़तरों से पसीने के सराबोर जबीन
मसरूफ़ किसी काम में देखूँ जो तुझे
तू और भी मुझको नज़र आती है हसीन

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