रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 3

रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 3

वो दूर सफ़र पे जब भी जाएँगे सखी

वो दूर सफ़र पे जब भी जाएँगे
साड़ी कोई कीमती सी ले आएँगे
चाहूँगी उसे सैंत के रख लूँ लेकिन
पहनूँ न उसी दिन तो बिगड़ जाएँगे

सीने पे पड़ा हुआ ये दोहरा आँचल

सीने पे पड़ा हुआ ये दोहरा आँचल
आँखों में ये लाज का लहकता काजल
तहज़ीब की तस्वीर हया की देवी
पर सेज पर कितनी शोख़ कितनी चंचल

हर रस्मो-रिवायत को कुचल सकती हूँ

हर रस्मो-रिवायत को कुचल सकती हूँ
जिस रंग में ढालें मुझे ढल सकती हूँ
उकताने न दूँगी उनको अपने से कभी
उनके लिये सौ रूप बदल सकती हूँ

हर सुबह को गुंचे में बदल जाती है

हर सुबह को गुंचे में बदल जाती है
हर शाम को शमा बन के जल जाती है
और रात को जब बंद हों कमरे के किवाड़
छिटकी हुई चाँदनी में ढल जाती है

हर एक घड़ी शाक़ गुज़रती होगी

हर एक घड़ी शाक़ गुज़रती होगी
सौ तरह के वहम करके मरती होगी
घर जाने की जल्दी तो नहीं मुझको मगर
वो चाय पर इन्तज़ार करती होगी

शाम और भी दिलनशीन हो जाती है

शाम और भी दिलनशीन हो जाती है
फूलों की तरह ज़मीन हो जाती है
चलती हूँ जो साथ-साथ उनके तो सखी
खुद चाल मेरी हसीन हो जाती है

 

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