रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 2

रुबाइयाँ(क़ितयात ) -जाँ निसार अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Jaan Nisar Akhtar collections Part 2

नज़रों से मेरी खुद को बचाले कैसे

नज़रों से मेरी खुद को बचाले कैसे
खुलते हुए सीने को छुपाले कैसे
आटे में सने हुए हैं दोनों ही हाथ
आँचल जो सँभाले तो सँभाले कैसे

दुनिया की उन्हें लाज न ग़ैरत है सखी

दुनिया की उन्हें लाज न ग़ैरत है सखी
उनका है मज़ाक़ मेरी आफ़त है सखी
छेड़ेंगे मुझे जान के सब के आगे
सच उनकी बहुत बुरी आदत है सखी

पानी कभी दे रही है फुलवारी में

पानी कभी दे रही है फुलवारी में
कपड़े कभी रख रही है अलमारी में
तू कितनी घरेलू सी नज़र आती है
लिपटी हुई हाथ की धुली सारी में

मन था भी तो लगता था पराया है सखी

मन था भी तो लगता था पराया है सखी
तन को तो समझती थी कि छाया है सखी
अब माँ जो बनी हूँ तो हुआ है महसूस
मैंने कहीं आज खुद को पाया है सखी

रहता है अजब हाल मेरा उनके साथ

रहता है अजब हाल मेरा उनके साथ
लड़ते हुए अपने से गुज़र जाती है रात
कहती हूँ इतना न सताओ मुझको
डरती हूँ कहीं मान न जायें मेरी बात

वो आयेंगे चादर तो बिछा दूँ कोरी

वो आयेंगे चादर तो बिछा दूँ कोरी
पर्दों की ज़रा और भी कस दूँ डोरी
अपने को सँवारने की सुधबुध भूले
घर-बार सजाने में लगी है गोरी

वो ज़िद पे उतर आते हैं अक्सर औक़ात

वो ज़िद पे उतर आते हैं अक्सर औक़ात
हर चीज पे वह बहस करेंगे मेरे साथ
हरगिज़ वो न मानेंगे जो मैं चाहूँगी
लेकिन जो मैं चाहूँगी करेंगे वही बात

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