रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 7

रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 7

ना वो रास्ते, ना वो हमसफ़र

ना वो रास्ते, ना वो हमसफ़र, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे,
वो जो शहर था, है वही मगर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

जो हमारे दिल पे गुज़र गयी, जो तुम्हारे दिल पे गुज़र गयी,
ना हमें पता ना तुम्हें ख़बर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

हमें फ़ख्र अपने सुलूक पर, तुम्हें नाज़ अपने खुलूस पर,
मगर अपने अपने मुकाम पर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

कभी हम तुम्हारे करीब थे, कभी तुम हमारे हबीब थे,
मगर अब नहीं कोई मोतबर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

कभी रात मन्नतें माँगना, कभी सुबह देर से जागना,
ना वो शब रही ना रही सहर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

जो तआलुक्कात थे क्या हुए, जो तसव्वुरात थे क्या हुए,
कि वफ़ा ए इश्क़ के मोड़ पर, ना वो हम रहे, ना वो तुम रहे…

अभी दिल में दर्द कम है, अभी आँख तर नहीं है

अभी दिल में दर्द कम है, अभी आँख तर नहीं है,
तेरे गम से मेरा रिश्ता अभी मोतबर नहीं है…

हैं ज़माने भर में चर्चे मेरी सर बुलन्दियों के,
ये इनायतें हैं तेरी ये मेरा हुनर नहीं है…

तुझे लिख के जो ना चूमे, तुझे देख कर ना झूमे,
तो ज़ुबाँ, ज़ुबाँ नहीं है, वो नज़र, नज़र नहीं है…

ये ज़माना लाख गुज़रे नये हादसों से लेकिन,
मैं तेरी पनाह में हूँ, मुझे कोई डर नहीं है…

ये जो आख़िरी सफ़र है यही हासिल ए सफ़र है,
मगर इस सफ़र में अपना कोई हमसफ़र नहीं है…

जहाँ से गुज़रो धुआँ बिछा दो

जहाँ से गुज़रो धुआँ बिछा दो, जहाँ भी पहुँचो धमाल कर दो,
तुम्हे सियासत ने हक दिया है, हरी ज़मीनों को लाल कर दो

मोहब्बतों का हूँ मैं सवाली, मुझे भी एक दिन निहाल कर दो,
नज़र मिलायो, नज़र मिला कर, फ़कीर को मालामाल कर दो

अपील भी तुम, दलील भी तुम, गवाह भी तुम, वकील भी तुम,
जिसे भी चाहो हराम लिख दो, जिसे भी चाहो हलाल कर दो

है सादगी में अगर ये आलम, कि जैसे बिजली चमक रही है,
जो बन संवर के सड़क पे निकलो, तो शहर भर में धमाल कर दो

तुम्ही सनम हो, तुम्ही ख़ुदा हो, वफ़ा भी तुम हो, तुम ही जफ़ा हो,
सितम करो तो मिसाल कर दो, करम करो तो कमाल कर दो

तुम्हें किसी की कहां है परवाह, तुम्हारे वादे का क्या भरोसा,
जो पल की कह दो तो कल बना दो, जो कल की कह दो तो साल कर दो

अभी लगेगी नई नई सी, ये इक फज़ा है जो सुरमई सी,
जो ज़ुल्फ़ चेहरे से तुम हटा लो, तो सारा मंज़र गुलाल कर दो

ज़िन्दगी नाम को हमारी है

ज़िन्दगी नाम को हमारी है,
आखरी सांस भी तुम्हारी है…

तेरी चाहत कहाँ पे ले आयी,
तुमसे मिल कर भी बेकरारी है…

मुझसे पूछो चमक सितारों की,
मैंने रो रो के शब गुज़ारी है…

आपके हाथ में लकीरें हैं,
वरना तकदीर तो हमारी है…

एक तस्वीर में हैं दो शक्लें,
या हमारी है, या तुम्हारी है…

दिल मेरा तोड़ते हो, तो तोड़ो,
चीज़ मेरी नहीं तुम्हारी है…

मुस्कुराहट ज़वाब में रखना

मुस्कुराहट जवाब में रखना,
आँसुओं को नकाब में रखना

ज़िन्दगी सिर्फ़ एक तेरी ख़ातिर,
रूह कब तक अज़ाब में रखना

मैंने ये तय नहीं किया अब तक,
ज़िन्दगी किस हिसाब में रखना

ठोकरें, ज़ुल्मतें, सितम, आँसू,
सारी बातें हिसाब में रखना

जाम दुख का हो चाहे सुख का हो,
गर्क मुझको शराब में रखना

तुमको पहचानता नहीं कोई,
फिर भी चेहरा नकाब में रखना

मेरी आँखों में कैद थी बारिश

मेरी आँखों में क़ैद थी बारिश
तुम ना आये तो हो गयी बारिश

आसमानों में खो गया सूरज
नदियों में ठहर गयी बारिश

फूल पर, पत्तियों पे, पलकों पर
कितने मोती सजा गयी बारिश

गांव में इक मकान भी ना बचा
और सब देखती रही बारिश

तिशनगी ढूंढती है बरसों से
नहर झरना कुआँ नदी बारिश

बीते लम्हों की वो उमस थी के बस
तेरी याद आयी आ गयी बारिश

ठंडे सूरज की छाँव में बैठी
रात भर की थकी हुई बारिश

वो इक इक बात पे रोने लगा था

वो इक इक बात पे रोने लगा था
समुंदर आबरू खोने लगा था

लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी
मैं आँखें खोल कर सोने लगा था

चुराता हूँ अब आँखें आइनों से
ख़ुदा का सामना होने लगा था

वो अब आईने धोता फिर रहा है
उसे चेहरे पे शक होने लगा था

मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया
मैं सब के सामने रोने लगा था

ये ज़िन्दगी किसी गूंगे का ख़्वाब है बेटा

ये ज़िन्दगी किसी गूंगे का ख़्वाब है बेटा
संभल के चलना के रस्ता ख़राब है बेटा

हमारा नाम लिखा है पुराने किलओं पर
मगर हमारा मुकद्दर ख़राब है बेटा

गुनाह करना किसी बेगुनाह की ख़ातिर
मेरी निगाह में कार-ए-सवाब है बेटा

अब और ताश के पत्तों की सीढ़ियों पे ना चढ़
के इसके आगे ख़ुदा का अज़ाब है बेटा

हमारे सहन की मेहँदी पे है नज़र उसकी
ज़मीनदार की नीयत ख़राब है बेटा

रास्ता भूल गया क्या इधर आने वाला

रास्ता भूल गया क्या इधर आने वाला
अब तो ये सुबह का तारा भी है जाने वाला

याद के फूल को पलकों पे सजा के रखना
ये मुसाफिर है बहोत दूर से आने वाला

आप उस शख़्स से वाकिफ तो हैं कम वाकिफ हैं
वो मसीहा है मगर ज़ख़्म लगाने वाला

अजनबी शहर से मायूस ना हो चल तो सही
मिल ही जाएगा कोई साथ निभाने वाला

जिस्म में सांस थी जब तक वो मुखालिफ़ ही रहा
मेरा दुश्मन था मगर साथ निभाने वाला

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