रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 8

रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 8

आप हमसे बेखबर ऐसे ना थे

आप हमसे बेखबर ऐसे ना थे,
दिल के दुश्मन थे मगर ऐसे ना थे…

तुम ना थे तो ज़िन्दगी बेरंग थी,
रात दिन शाम ओ सहर ऐसे ना थे…

मंज़िलें दुश्वार थीं कल भी मगर,
रास्ते और हमसफ़र ऐसे ना थे…

अब तो हर खिड़की में रोशन चाँद है,
पहले इस बस्ती में घर ऐसे ना थे…

तेरे दर से उठ के ये हालत हुई,
कल तलक हम दर बदर ऐसे ना थे…

प्यार का रिश्ता कितना गहरा लगता है

प्यार का रिश्ता कितना गहरा लगता है,
हर चेहरा अब तेरा चेहरा लगता है…

तुमने हाथ रखा था मेरी आँखों पर,
उस दिन से हर ख़्वाब सुनहरा लगता है…

उस तक आसानी से पहुँचना मुश्किल है,
चाँद के दर पर रात का पहरा लगता है…

जबसे तुम परदेस गये हो बस्ती में,
चारों तरफ़ सेहरा ही सेहरा लगता है…

कच्चे घड़े के रिश्ते अब तो ख़त्म हुए,
दरिया भी कुछ ठहरा ठहरा लगता है…

मज़बूरी रोने भी नहीं देती मुझको,
दरियाओं पे आज भी पहरा लगता है…

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है,
पहले कुछ दिन आना जाना पड़ता है…

ख़ुश रहना आसान नहीं है दुनिया में,
दुश्मन से भी हाथ मिलाना पड़ता है…

इश्क में सचमुच का नहीं तो वादों का,
ताजमहल सबको बनवाना पड़ता है…

यूँ ही नहीं रहता है उजाला बस्ती में,
चाँद बुझे तो घर भी जलाना पड़ता है…

तुम क्या जानो तन्हा कैसे जीते हैं,
दीवारों से सर टकराना पड़ता है…

तू भी फलों का दावेदार निकल आया,
बेटा पहले पेड़ लगाना पड़ता है…

मुश्किल फ़न है ग़ज़लों की रोटी खाना,
बहरों को भी शेर सुनाना पड़ता है…

कई दिनों से अंधेरों का बोलबाला है

कई दिनों से अंधेरों का बोलबाला है
चराग़ ले के पुकारो, कहां उजाला है

ख़याल में भी तेरा अक्स देखने के बाद,
जो शख़्स होश गँवा दे, वो होश वाला है

जवाब देने के अन्दाज़ भी निराले हैं,
सलाम करने का अन्दाज़ भी निराला है

सुनहरी धूप है सदका तेरे तबस्तुम का,
ये चाँदनी तेरी परछाई का उजाला है

मैं तुझ को कुफ़्र से तशबीह दूँ कि इमाँ से,
पता नहीं कि तू मस्जिद है या शिवाला है

मज़ाक उड़ाते हैं पानी के बुलबुले उसका,
जिस आदमी ने समन्दर निचोड़ डाला है

है तेरे पैरों की आहट ज़मीन की गर्दिश,
ये आसमाँ तेरी अँगड़ाई का हवाला है

मेरे पयम्बर का नाम है जो मेरी ज़ुबाँ पे चमक रहा है

मेरे पयम्बर का नाम है जो मेरी ज़ुबाँ पे चमक रहा है
गले से किरणें निकल रही हैं, लबों से ज़मज़म छलक रहा है

मैं रात के आखरी पहर में जब आपकी नात लिख रहा था
लगा के अल्फाज़ जी उठे हैं लगा के काग़ज़ धड़क रहा है

सब अपनी अपनी ज़ुबाँ में अपने रसूल का ज़िक्र कर रहे हैं
फ़लक पे तारे चमक रहे हैं, शजर पे पत्ता खड़क रहा है

यहाँ अली भी हैं, फातमा भी, हसन भी हैं और हुसैन भी हैं,
तमाम मगरिब, तमाम मशरिक, नबी का गुलशन महक रहा है

ज़मीन महरूम ही रही है, हमेशा पा’बोसिए नबी से,
जहाँ कदम आपके पड़े हैं, वहाँ वहाँ तो फ़लक रहा है

मेरे नबी की दुआएँ हैं ये, मेरे ख़ुदा की अताएँ हैं ये,
कि ख़ुश्क मिट्टी का ठिकरा भी, हयात बन कर खनक रहा है

आग में फूलने फलने का हुनर जानते हैं

आग में फूलने फलने का हुनर जानते हैं,
ना बुझा हमको के जलने का हुनर जानते हैं…

हर नये रंग में ढलने का हुनर जानते हैं,
लोग मौसम में बदलने का हुनर जानते हैं…

आपने सिर्फ़ गिराने की अदा सीखी है,
और हम गिर के संभलने का हुनर जानते हैं…

क्या समेटेगा हमेँ वक़्त का गहरा दरिया,
हम किनारों से उबलने का हुनर जानते हैं…

शौक से आयें मेरे साथ मेरे साथ चलें,
आप अगर आग ये चलने का हुनर जानते हैं…

चाल चलने में महारत है यहाँ लोगों को,
और हम बच के निकलने का हुनर जानते हैं…

तोड़ दे ये ख़यालों की बैसाखियाँ

तोड़ दे ये ख़यालों की बैसाखियाँ और पैरों पे चलने का फन सीख ले,
रुख हवा का बदलने की फिर सोचना, पहले कपड़े बदलने का फन सीख ले…

लोग मौसम की सूरत बदलने लगे, फूल भी अपनी रंगत बदलने लगे,
आईने अपनी फितरत बदलने लगे, तू भी चेहरा बदलने का फन सीख ले…

कोई रस्ता ना देगा तुझे भीड़ में, रेंगते रेंगते उम्र कट जाएगी,
शौक से तू मेरी पीठ पे वार कर, मुझसे आगे निकलने का फन सीख ले…

मुझ पे तेरी नज़र, तुझ पे मेरी नज़र, ये सफ़र में ज़रूरी है ए हमसफ़र,
मैं संभल कर बहकने का गुर सीख लूं, तू बहक कर संभलने का फन सीख ले…

ज़िन्दगी मौत है, मौत है ज़िन्दगी, रोशनी का तसव्वुर भी है रोशनी,
तू है सूरज तो ढलने पे ईमान रख, और दिया है तो जलने का फन सीख ले…

छानते हैं जो गहराई वो हम नहीं, है समन्दर से रिश्ता यही कम नहीं,
ये भी तहज़ीब है इस बड़े शहर की, साहिलों पे टहलने का फन सीख ले…

हैं धुआँ जिस तरह बर्फ़ के दरमियाँ, छांव में ला के रख धूप की गरमियां,
आग से दोस्ती का अगर शौक है, मोम बन कर पिघलने का फन सीख ले…

अब ना मैं वो हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे

अब ना मैं वो हूँ, ना बाकी है ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे

ज़िन्दगी है तो नए ज़ख़्म भी लग जायेंगे
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे

आप से रोज़ मुलाकात की उम्मीद नहीं
अब कहाँ शहर में रहते हैं ठिकाने मेरे

उम्र के राम ने साँसों का धनुष तोड़ दिया
मुझपे एहसान किया आज ख़ुदा ने मेरे

आज जब सो के उठा हूँ तो ये महसूस हुआ
सिसकियाँ भरता रहा कोई सिरहाने मेरे

(अहमद फराज़ के एक मिसरे से तसर्रुफ़ किया गया है)

बुज़ुर्ग मट्टी की अज़मत के एतराफ़ में है

बुज़ुर्ग मट्टी की अज़मत के एतराफ़ में है
ये मकबरा है मगर रेशमी गिलाफ़ में है

नमाज़ियों के तक़द्दुस पे तंज़ करता था
वो बदमआाश कई दिन से एतकाफ़ में है

रफाक़तों के हवाले से ज़िक्र आता है
बड़ा खुलूस तेरे मेरे इख्तिलाफ़ में है

सवेरे तक तो मुझे बर्फ़ करके रख देगा
अकेलेपन का जो मौसम मेरे लिहाफ़ में हे

हैं ख़ुशबुयों के तआक्कुब में रेंगते कछुए
मगर वो मुश्क अभी तक हिरन की नाफ़ में है

क़तरा क़तरा खूब उछालें गंगा जी

क़तरा क़तरा खूब उछालें गंगा जी
हम प्यासों पर हाथ न डालें गंगा जी

बस्ती वाले सब कुछ देखते रहते हैं
साहिल पर दीवार उठा लें गंगा जी

कैसे कैसे लोगों ने असनान किया
हुक्म मिले तो हम भी नहा लें गंगा जी

हम तो किनारे के पानी में डूबे हैं
देखें कितनी दूर निकालें गंगा जी

सारी दुनिया आपको अमृत कहती है
फूलों पर तेज़ाब ना डालें गंगा जी

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं

कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं,
रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं

शब गुज़ार आया हूँ मस्जिद में के मैखाने में
मुझसे मुछो न सवालात मुझे होश नहीं…

मुझको ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं…

आँसुओं और शराबों में गुज़र है अब तो
मैंने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं…

जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा
बिखरे-बिखरे हैं ख़यालात मुझे होश नहीं…

मैंने बेहोशी के आलम में बका है क्या क्या
दिल पे लेना न कोई बात मुझे होश नहीं…

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