रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 2

रुत-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 2

नया साल

एक ख़्वाब जो गुज़रा है अभी पिछले बरस का
आतंक का घपलों का जुलूसों का हवस का
हर रंग से एक रंग नया आँक रहा है
सैलाब का तूफ़ान का बारिश का उमस का

ये रेंगते मौसम ये खिसकते हुए दिन रात
ये बदली हुई दुनिया बदलते हुए हालात
एक टूटे हुए चाक पे हम घूम रहे हैं
मालूम नहीं अब के अज़ाब आये या सौगात

दीवार के ख़ुशरंग कलेंडर ख़ुदा हाफ़िज़
ए जाते हुए माह दिसम्बर ख़ुदा हाफ़िज़
आंखें नयी उम्मीद लिए चीख रही हैं
ए उम्र के चलते हुए चक्कर ख़ुदा हाफ़िज़

भूचाल अगर आये तो भूचाल मुबारक
जंजाल अगर आये तो जंजाल मुबारक
बारूद के एक ढेर पे बैठे हुए हम लोग
किस धूम से कहते हैं नया साल मुबारक…

निशाने चूक गए सब निशान बाकी है

निशाने चूक गए सब निशान बाकी है
शिकारगाह में खाली मचान बाकी है

ये अलग बात के अब ख़ुशबुएँ नहीं लेकिन
हमारे ताक में एक इत्रदान बाकी है

फिर एक बच्चे ने लाशों के ढेर पर चढ़कर
ये कह दिया के अभी खानदान बाकी है

ज़मीन दूर है और आस पास कोई नहीं
मैं किससे से पूछूं के कितनी उड़ान बाकी है

अदालतों को अभी इन्तज़ार है उसका
वो जिस गवाह के मुँह में ज़ुबान बाकी है

मेरे मरने की ख़बर है उसको

मेरे मरने की ख़बर है उसको
जाने किस बात का डर है उसको

बन्द रखता है वो आँखें अपनी
शाम की तरह सहर है उसको

मैं किसी से भी मिलूँ कुछ भी करूं
मेरी नीयत की ख़बर है उसको

भूल जाना भी उसे सहल नहीं
याद रखना भी हुनर है उसको

मंज़िलें साथ लिए फिरता है
कितना दुश्वार सफ़र है उसको

क्यूं भड़क उठता है जलते जलते
कुछ हवाओं का असर है उसको

अब वो पहला सा नज़र आता नहीं
ऐसा लगता है नज़र है उसको

तेरी आँखों की हद से बढ़ कर हूँ

तेरी आँखों की हद से बढ़ कर हूँ
दश्त मैं आग का समन्दर हूँ

कोई तो मेरी बात समझेगा
एक क़तरा हूँ और समन्दर हूँ

तोड़ डाला है जिस्म का ज़ीनदाँ
आज मैं अपने घर के बाहर हूँ

झूठ के नर्क में ना डाल मुझे
लोग कहते हैं मैं युधिष्ठिर हूँ

मैं भी इक मुंजमिद सदा हूँ मगर
खैर से गुम्बदों के बाहर हूँ

मेरी गर्दन में भी हैं गम के नाग
मैं भी अपने समय का शंकर हूँ

समन्दरों पे कोई शहर बसने वाला है

समन्दरों पे कोई शहर बसने वाला है
दिमाग़ सोच की गहराईयों में डूबा है

ये आज राह में पत्थर का ढेर कैसा है
ज़रूर कोई पयंबर इधर से गुज़रा है

अज़ीज़ों आज भी आँखें मेरी वहीं हैं मगर
अब इनमें तुम नहीं रहते हो ख़ून रहता है

जो पत्थरों से बुतों को तराशता था कभी
उस आदमी का सुलूक अब बुतों ही जैसा है

मैं अपने अहद की तारीख़ जब भी पढ़ता हूँ
हर एक लफ़्ज़ मुझे मरसिया सुनाता है

वो मेरी जान का दुश्मन सही मगर राहत
कभी कभी तो मेरे शे’र गुनगुनाता है

तू शब्दों का दास रे जोगी

तू शब्दों का दास रे जोगी
तेरा कहाँ विश्वास रे जोगी

इक दिन विष का प्याला पी जा
फिर न लगेगी प्यास रे जोगी

ये सांसों का बन्दी जीवन
किसको आया रास रे जोगी

विधवा हो गई सारी नगरी
कौन चला बनबास रे जोगी

पूर आई थी मन की नदिया
बह गए सब एहसास रे जोगी

इक पल के सुख की क्या क़ीमत
दुख हैं बारह मास रे जोगी

बस्ती पीछा कब छोड़ेगी
लाख धरे सन्यास रे जोगी

बेवफ़ा होगा, बावफ़ा होगा

बेवफ़ा होगा, बावफ़ा होगा,
उससे मिल कर तो देख क्या होगा

बैर मत पालिए चरागों से
दिल अगर बुझ गया तो क्या होगा

सर झुका कर जो बात करता है
तुमसे वो आदमी बड़ा होगा

क़हक़हे जो लुटा रहा था कभी
वो कहीं छुप के रो रहा होगा

उससे मिलना कहाँ मुक़द्दर है
और जी भी लिए तो क्या होगा

राहत एक शब में हो गये हैं रईस
कुछ फ़क़ीरों से मिल गया होगा

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