रुत आ गयी रे-ग़ज़लें व फ़िल्मी गीत-जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

रुत आ गयी रे-ग़ज़लें व फ़िल्मी गीत-जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

रुत आ गयी रे
रुत छा गयी रे

पीली-पीली सरसों फूले
पीले-पीले पत्ते झूमें
पीहू-पीहू पपीहा बोले
चल बाग़ में

धमक-धमक ढोलक बाजे
छनक-छनक पायल छनके
खनक-खनक कंगना बोले
चल बाग़ में

चुनरी जो तेरी उड़ती है
उड़ जाने दे
बिंदिया जो तेरी गिरती है
गिर जाने दे

गीतों की मौज आयी
फूलों की फौज आयी
नदियां में जो धूप घुली
सोना बहा…
अम्बवा से है लिपटी
एक बेल बैले की
तू ही मुझसे है दूर
आ पास आ…
मुझको तो सांसों से छु ले
झूलूं इन बाहों के झूले
प्यार थोड़ा सा मुझे दे के
मेरे जानों दिल तू ले ले…

तू जब यूं सजती है
इक धूम मचती है
सारी गलियों में
सारे बाज़ार में…
आंचल बसंती है
उसमें से छनती है
जो मैंने पूजी है
मूरत प्यार में…
जान कैसी है ये डोरी
मैं बंधा हूं जिससे गोरी
तेरे नैनों ने मेरी नींदों की
कर ली है चोरी…

रुत आ गयी रे
रुत छा गयी रे

(1947 अर्थ)

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