रुक कर जाती हुई रात-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

रुक कर जाती हुई रात-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

रुक कर जाती हुई रात का
अन्तिम छांहों-भरा प्रहर है
श्वेत धुएँ से पतले नभ में
दूर झाँवरे पड़े हुए सोने-से तारे
जगी हुई भारी पलकों से पहरा देते
नींद-भरी मन्दी बयार चलती है
वर्षा-भीगा नगर
भोर के सपने देख रहा है अब भी
लम्बे-लम्बे धुँधले राजपथों में
निशि-भर जली रोशनी की
कुछ थकी उदासी मंडराती है ।
पानी रंगे हुए बँगलों के वातायन से
थकी हुई रंगीनी में डूबा प्रकाश अब भी दिख जाता
रेशम-पर्दों, सेजों, निद्रा-भरे बन्धनों की छाया-सा ।

बुझी रात का अभी अख़ीरी पहर नहीं उतरा है,
दूरी के रेखा-छाँहों से पेड़ों ऊपर
ठण्डा-ठण्डा चाँद ठिठक कर मंदा होता
नभ की लम्बी साया दूरी तक पड़ती है ।

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