रुक्मिणी की मनः इच्छा-कविता-दीपक शर्मा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Sharma

रुक्मिणी की मनः इच्छा-कविता-दीपक शर्मा-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Deepak Sharma

 

हे कृष्ण!
मैं कुछ दिन के लिए
राधा बनना चाहती हूँ
तुम भी कान्हा बन जाओ ना

मुझसे प्रेम करो
जैसे किया था तुमने राधा से
कुछ दिन के लिए
रख दो चक्र सुदर्शन
बजाओ मेरे लिए बांसुरी
बनाओ शरीर का त्रिभंगी आकार
मैं नृत्य करना चाहती हूँ
कुछ क्षण तुम्हारे साथ
कुछ क्षण के लिए भूल जाओ अपना ब्रह्रत्व
मेरे साथ करो किसोरपन की लीलाएं
मैं चाहती हूँ
यमुना किनारे करूँ
तुम्हारे साथ वन-विहार
देर तक देखूँ
लता, कुंज और डालियां
तालाब में तैरती मछलियाँ
आकाश में उड़ती चिड़ियाँ
फिर किसी कदम्ब के नीचे
बैठ जाऊँ इत्मीनान से
मेरी जांघ पर तुम
रख देना सिर
जिससे देख सकूँ मैं
तुम्हारी आँखो में
अपनी छवि
सहला सकूँ
तुम्हारे कोमल केश
और अनुभव कर सकूँ
लौकिक प्रेम।

हे कृष्ण!
मैं कुछ दिन के लिए
राधा बनना चाहती हूँ
तुम भी कान्हा बन जाओ ना

 

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